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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 572

( ४५४ )

क्योंकि यह संसार मतलबका है ; बिना स्वार्थ, बिना मतलब और बिना पैसे कोई बात नहीं करता । मतलबसे ही लोग एक दूसरेके नातेदार और सम्बन्धी बने हुए हैं ; वास्तवमें , कोई किसीका नहीं है ।

कहा है :—

वृत्तं जीणफलं त्यजन्ति विहगाः, शुष्कसरः सारसाः । पुण्यं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपा, दग्धं वनान्तं मृगाः ॥ निर्दुःखं पुरुषं त्यजन्ति गणिकाः मृष्टिश्रयं मन्त्रिणः । सर्वः कार्यवशाद् जनोऽभिरसते, कस्यास्तिनो वल्लभः ? ॥

फलहीन वृक्षको पक्षी त्याग देते हैं, सूखे तालाबको सारस छोड़ देते हैं, मधुहीन फूलोंको भौरै त्याग देते हैं, जले हुए वनको हिस्त्र छोड़ देते हैं, धनहीन पुरुषको वेश्या त्याग देती है और श्रीहीन राजाको मन्त्री त्याग देते हैं । सब मतलबसे एक दूसरेको चाहते हैं ; नहीं तो कौन किसका प्यारा है ?

“मोहमुद्गर” में लिखा है :—

यावद् वित्तोपार्जनशक्तः, तावत् निज परिवारो रक्तः । तदनु च जया जर्जर देहे, वात्तां कौडपि न प्रच्छति गेहे ॥

जब तक धन कमाने की सामर्थ्य रहती है, तब तक कुटुम्ब के लीग राजी रहते हैं ; इसके बाद, बुढ़ापे से शरीर जर्जर होते ही, कोई बात तक नहीं पूछता ।