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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

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संसारकी यही धारा है। जिस पुत्रके लिये बचपनमें कहीं से धन लाते और उसे अच्छा पिलाते-बिलाते और पहनाते थे, हर तरह लाड़-प्यार करते थे; पास पैसा न होनेपर भी, पढ़ाने-लिखाने में अपनी शक्ति से अधिक खर्च करते थे; आप तंगी भोगते थे, पर पुत्रको तंगदस्त न होने देते थे; आप फटे कपड़े पहने फिरते थे; पर उसे अच्छे-अच्छा-पहनाते थे; अब वही पुत्र मुँहसे नहीं बोलता, मौका पड़नेसे वह या उसके पुत्र गालियाँ देते और कभी-कभी बूढ़ेको मार तक बैठते हैं; पुत्र-बधुयें दिन-भर तनतनाया करती और कहती हैं,—“ससुरजी मरें तो संकट कटे; दिन-भर पड़े-पड़े खाते और थूक-थूक कर घर खराब करते हैं; हमसे तो रोजकी रोज मेला साफ नहीं होता।” बेटोंकी बहुएँ तो बहुएँ, खास अपनी अर्द्धाङ्गी देखते ही आँखें बड़ा लेती और खाँड-खाँड करती रहती है; बूढ़े पत्रिको आलिङ्गन करजा, उसकी सेवा करना तो दूरकी बात है, उसे पास बैठाना भी बुरा समझती है। बीमारोंमें सेवा-शुश्रूषा करती-करती कहने लगती है—“अब तो तुम मर जाओ तो अच्छा हो। मुझसे यह सब अब नहीं होता।” कहाँ तक गिनाव, बुढ़ापेमें ऐसे-ऐसे अनगित्तो दुःख आ घेरते हैं; पर आश्चर्य्य तो यह है कि, इतने पर भी, अज्ञानियोंका मोह नहीं छूटता। हमें एक मोहान्ध बूढ़ेकी कहानी याद आई है, उससे पाठकों को बहुत कुछ ज्ञान होगा—उनकी आँखें खुल जायगी:—