वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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एक बूढ़े सेठ की दुर्दशा ।
किसी नगरमें एक बूढ़ा सेठ रहता था । उसने जवानोंमें बहुतसा धन सञ्चय किया था । बुढ़ापेमें, पुत्रोंने उससे सारा धन अपने हाथोंमें ले लिया । बूढ़ेको पौलीमें, एक रूटी सी चार-पाई पर, एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछाकर पटक दिया । एक लाठी उसके हाथमें दे दी और कह दिया कि, घरमें चोर-चकाँर या कुत्ता-बिल्ली न आने पावे । सब घरके भोजन कर लेने पर, बच्चा-खुच्चा-खाना एक फूटीसी थालीमें रखकर बहुधा बूढ़ेको दे जाती । कुछ दिन इसतरह गुजरे । पुत्र-बधुओंको यह भी अच्छा न लगा । उन्होंने कहा—“ससुरजीके कारण निकलने-बेठनेमें बार-बार धूँघट करना होता है, इससे बड़ा कष्ट होता है । अच्छा हो यदि ये ऊपरके चौबारेमें रख दिये जायँ और एक घण्टी इन्हें दे दी जाय । जब इन्हें किसी चीजकी ज़रूरत होगी, यह घण्टी बजा देंगे ।” कलियुगमें जोरुका हुकम खुदाके हुकमके बराबर समझा जाता है । बेठोंने अपनी घरवालिथोंकी बात मंज़ूर कर ली और कह-सुन कर बूढ़ेको ऊपर पहुँचा दिया और एक घण्टी उसे दे दी । बूढ़ेको जब खाना या पानी वगैरः की ज़रूरत होती, घण्टी बजा देता । कुछ दिनों बाद, एक दिन, बूढ़ेका नाती ऊपर चला गया । बूढ़ा उसे खिलाता रहा । शेषमें, वह खेलता-खेलता घण्टी ले आया । अब तो मुश्किल हो गई ; बूढ़ा खाने-पीने बिना मर गया । २४ घण्टे बीतने