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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 575

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पर किसीको उसकी याद आई। देखा, तो बूढ़ेराम कुछ कर गये थे। पुत्रोंने उसे श्मशान पर लेजाकर जला दिया। बुढ़ापेमें ऐसी ही दुर्गति होती है।

बुढ़ापेमें ममता और भी बढ़ जाती है।

एक बूढ़ा अपने मकानको पौलोंमें पड़ा रहता था। कोई उसकी बात न पूछता था। बेचारा ज्यों त्यों करके दिन काटता था। एक दिन उसका पोता उसे मारने और गाली देने लगा। बूढ़ा भी उसे गाली देने लगा। इतनेमें नारदजी उधरसे आ निकले। उन्होंने बूढ़ेसे सारा हाल पूछा। उसकी दुर्दशाका हाल सुनकर, नारद जीने उससे कहा—“तुम्हारा जीवन चूथा है। तुम या तो बनमें जाकर तप करो या हमारे साथ स्वर्गको चलो।” सुनते ही बूढ़ा लाल हो गया और बोला—“महाराज! अपनी राह लीजिये। मेरे नाती-बेटे मुझे मारे चाहें गाली दें, आप क्राज़ी या मुल्ला? मैं इन्होंने खुश हूँ।” नारदजी संसारकी मोह-ममता देखकर दक्कू रह गये। बात यह है कि, अज्ञानी लोगों की तृष्णा और ममता बुढ़ापेमें औरभी बढ़ जाती है। वे हज़ारों तरहके कष्ट सहते और अपमानित होते हैं; पर गृहस्थाश्रमको नहीं त्यागते। इसी मिथ्या और स्वार्थपर संसारकी हाय-हायमें एक दिन मर जाते और ममताके कारण