सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 583

( ४६५ )

नित्य और अविनाशी है, उसे नाश करने वाला जगत्में कोई भी नहीं। गीता में कहा है—

नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि, नैनं दहति पावकः ।

न चैनं द्वेदयन्त्यापो, न शोषयति माक्षतः ॥ २३ ॥

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥

सुभको काटे, कहँ है वह तलवार ।

दाग दे सुभको, कहँ है वह नार ॥

गरम सुभको करे, कहँ है वह पानी ।

हवामें कब ताब, सुखाने की ॥

मौतको मौत, न आयेगी ।

कसद मेरा, जो करके आयेगी ॥

मौत का शोक दूर करने का सुसन्ना ।

महात्मा बुद्ध के जमाने में, किसी स्त्री का इकलौता पुत्र मर गया। पुत्र-शोक सब शोकोंसे भारी होता है; इसलिये वह स्त्री शोकाभिभूत होकर, महात्मा बुद्धके पास गयी और उनसे लड़के के जिला देने की प्रार्थना की। महात्माने कहा—“जिस घरमें कोई न मरा हो, उस घरसे थोड़ेसे राईके

३०