वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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नित्य और अविनाशी है, उसे नाश करने वाला जगत्में कोई भी नहीं। गीता में कहा है—
नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि, नैनं दहति पावकः ।
न चैनं द्वेदयन्त्यापो, न शोषयति माक्षतः ॥ २३ ॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
सुभको काटे, कहँ है वह तलवार ।
दाग दे सुभको, कहँ है वह नार ॥
गरम सुभको करे, कहँ है वह पानी ।
हवामें कब ताब, सुखाने की ॥
मौतको मौत, न आयेगी ।
कसद मेरा, जो करके आयेगी ॥
मौत का शोक दूर करने का सुसन्ना ।
महात्मा बुद्ध के जमाने में, किसी स्त्री का इकलौता पुत्र मर गया। पुत्र-शोक सब शोकोंसे भारी होता है; इसलिये वह स्त्री शोकाभिभूत होकर, महात्मा बुद्धके पास गयी और उनसे लड़के के जिला देने की प्रार्थना की। महात्माने कहा—“जिस घरमें कोई न मरा हो, उस घरसे थोड़ेसे राईके
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