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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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ठहरनेकी धर्मशाला मात्र है ; अगर यह धर्मशाला दूट जायगी, तो आत्मा दूसरीमें जा रहेगा,—ऐसा ज्ञान होते ही, मनुष्यके मनमें भय और भावना नहीं रहती । दुःख-सुखका सम्बन्ध शरीरसे है, आत्मासे नहीं ; आत्माको दुःख-सुख नहीं व्यापते, क्योंकि वह निराकार है,—ऐसा ज्ञान होते ही, दुःख आप-से-आप भाग जाते हैं—हाँ, मौतकी याद हरदम रखनी चाहिये, क्योंकि मौतको याद रखनेसे पाप नहीं होते और परमात्माकी शरणमें शान्ति लाभ करना ही अच्छा मालूम होता है ; पर मौतसे डरना कभी न चाहिये । जो शरीर और आत्मा में भेद नहीं समझते, वे ही मौतके नाम से काँप उठते हैं ; किन्तु जो शरीर और आत्माको जुदा-जुदा समझते हैं, जीवनमें कभी पाप नहीं करते, सदा परायी भला करते और परमात्मा को हर क्षण याद करते हैं, वे हँसते-हँसते चोला छोड़ देते हैं । भोगमपितामह कई दिनों तक शरशय्या पर लेटे रहे, उन्हें जरा भी कष्ट न मालूम हुआ । अन्तिम दिन, उन्होंने, जगदीश को याद करते-करते, यह नश्वर चोला हँसते-हँसते त्याग दिया ।

भोगम पितामह आत्मतत्त्व को पूर्णतया जानने वाले थे । वे जानते थे कि, मैं पहले भी था, अब वर्तमानमें भी हूँ और आगे भविष्यमें भी इसी तरह रहूँगा । शत्रु मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकते । हाँ, वे मेरी इस देहका नाश कर सकते हैं, पर देहके नाश होनेसे मेरी क्या हानि ? इस देहके नाश होने पर, दूसरी देह इससे ताज़ा और नई मुझे मिलेगी । मेरा आर्त्मा

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