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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४६६ )

दाने ले आओ। अगर तुम वसे दाने ले आईं, तो हम तुम्हारे पुत्र को जिन्दा कर देगे।” वह स्त्री घर-घर पूछती फिरी; पर उसे एक घर भी ऐसा न मिला, जिसमें मौत न हुई थी। अतः वह बैरंग वापस आई और महात्मा से सारा हाल निवेदन कर दिया। सुनते ही महात्मा ने कहा—“मौत प्राणिमात्र के पीछे लगती हुई है; जो जन्मा है, वह अवश्य मरेगा। यह संसार नाशमान् है। आगे पीछे सब को इस जगत् से चल देना है। कोई सदा-सर्वदाके लिये यहाँ नहीं आया। इसलिये इसमें शोक को कोई बात नहीं। मूल ही मरे हुए का शोच किया करते हैं, ज्ञानी नहीं। ज्ञानी जानते हैं कि, आत्मा अजर, अमर, अविनाशी और नित्य है; इसीसे वे शोच नहीं करते; किन्तु मूर्ख देहको आत्मा समझते हैं; इसीसे शोक करते हैं।” महात्माका यह उपदेश सुनते ही, लीका शोक दूर हो गया और उसे परम शान्ति लाभ हुई।

भगवान् की शरण में ही सुख है।

इस जगत्में मनुष्यको किसी अवस्था में भी सुख नहीं है। फिर बुढ़ापा तो हर तरह दुःखोंको खानही है। अतः मनुष्यको जवानी में ही, आगे आनेवाले बुढ़ापेका ख्याल करके, विषयों से मनको हटा लेना और परिवार वालोंमें नामको भी मोह न रखना चाहिये। समझदारको कम-से-कम जवानीके उतारमें तो