वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४६७ )
वर जज़ाल त्याग, बनमें जा, परमात्माकी भक्ति और उपासना करनी चाहिये। मन बारम्बार दुबाने और समझानेसे शान्त हो जाता है और धीरे-धीरे रही-सही ममता भी छूट जाती है। अस्यासके कारण, अन्तकालमें भगवतमें ही मन रहनेसे, मनुष्य की मुक्ति भी हो जाती है; यानी आवागमनसे पीछा छूट जाता है। परब्रह्मकी शरणमें चले जानेसे जो आनन्द आता है, उसे लिखकर बता नहीं सकते।
खुलासा—बुढ़ापे का चित्र देखकर, मौतको सिर पर मँडराती समझ कर, कुटुम्बियों का नाता झूठा समझ कर विषय-वासनाओंको त्यागकर, पुत्र-कलत्र और धन-दौलतको ममता छोड़कर, वैराग्यमें मन लगाओ। अच्छा हो, यदि शरीरमें शक्ति-सामर्थ्य होते हुए वरसे निकलकर बनमें जा बसो और सबसे नाता तोड़, एकमात्र परमात्मासे नाता जोड़ लो। उसका नाता ही सच्चा नाता है; और सब नाते झूठे हैं। उसकी शरणमें चले जानेसे शोक-ताप सता नहीं सकते। भगवान्को भूलने से ही मनुष्य दुःख भोगता और संसारी शत्रुओं से तंग रहता है; किन्तु जो भगवान् के चरण-कमलों में चला जाता है, उसका कोई अनिष्ट कर नहीं सकता, और शोक-ताप तो उससे हज़ार कोस दूर भागते हैं। याद रखो, परमात्माकी शरणमें चले जाने वालेसे काल और यमराज तक भय खाते हैं और ऋद्धि सिद्धि तो उसके सामने हाथ बाँधे खड़ी रहती हैं। भगवान्ने कहा है:—