वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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की तरह निकली चली जा रही है। आश्चर्य्यकी बात है, फिर भी लोग वही काम करते हैं, जिससे उनका अन्तिष्ठ हो ! ॥१०६॥
बुढ़ापा मौत का पेशखीमा है ।
बुढ़ापा मौतका पेशखीमा या बकौल "सिसरो" जिन्दगीके डामा या नाटकका आखिरी सीन है। इसीसे चतुर पुरुष बुढ़ापे को देखते ही समझ लेते हैं कि, मौत अब आने ही वाली है—हमारे जीवन-नाटकका अन्तिम पर्दा गिरने ही वाला है—हमारी जिन्दगीका अभिनय अब ख़तम होने ही वाला है। इसीसे अगर उन्होंने जवानी और बचपनके दिन बुथाके जज़ालों में भी खोये हैं; तो बुढ़ापेमें वे चेत जाते हैं और सब तजकर हर भजने लगते हैं; पर ऐसे समझदारोंकी संख्या बहुत थोड़ी है। ज़ियादा तादाद उन अज्ञानियोंकी है, जो बुढ़ापेको सामने देखकर भी, दम और खाँसीके आक्रमण होनेपर भी, घर-वालोंसे तिरस्कृत होनेपर भी, संसारकी ममता नहीं छोड़ते। अनेक बूढ़े ठीक चला-चलीके समय शादी-विवाह करते हैं; अनेक बेटे पोतोंकी पालनामें लगे रहते हैं और अनेक धन बढ़ानेकी चिन्तामें ही मशगूल रहते हैं। इन सब कामोंसे मनुष्योंका अन्तिष्ठ साधन होता है। न तो उन्हें इस जन्ममें ही क्षण-भरको शान्ति मिलता है और न मरने पर अगले जन्ममें ही। ममता और कामनाके कारण उनका संसार-बन्धन दृढ़ होता जाता है और वे बारबार मरते और जन्म लेते हैं तथा