भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 524

( ४१० )

जिस-जिस चीज़में मनुष्यकी ममता है, वही-वही दुःखी है और जिस जिससे उसे उदासीनता है, वही सन्तुष्टता है। मत-लब यह कि, “ममता” ही दुःखोंका मूल है। घर-गृहस्थीमें रहो और गृहस्थोंके सारे कार्य-व्यवहार करो ; पर किसी भी पदार्थ में ममता मत रखो। तुम्हारी ओरसे कोई मर जाय तो शोक नहीं, धन-दौलत नष्ट हो जाय तो रंज नहीं, आ जाय तो खुशी नहीं ; इस तरह उदासीन-भाव रखो। अगर इस तरह गृहस्थी में रहो, तो तुमसे बढ़कर ज्ञानी कौन है ? तुम्हें अवश्य मोक्षपद मिलेगा।

निर्मीही पुरुष ।

—○—

एक मनुष्यके एक ही लड़का था ! लड़का जवान हो गया था । उसकी शादी भी हो गई थी । एक दिन पिताने किसी उद्देश्यसे शामको एक सभा बुलानेका निमन्त्रण दिया । देवयोगसे, दोपहरको उसका पुत्र अचानक मर गया । उसने उसकी लाशको बैठकमें लिटा कर, ऊपरसे कपड़ा उड़ा दिया और आप द्वार पर बैठकर शान्त-भावसे हुक्का पीने लगा । इतनेमें सभाका समय हो गया ; मित्र लोग आने लगे । उदमें से एक मित्र उसी बैठकमें किसी ज़रूरी कामसे गया । वहाँ एक लाश पड़ी देख, उसने बाहर आकर पूछा,— “यह क्या !”