वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४०६ )
दृण्ड-कमण्डल बाहर रक्खा है, कहीं वह न जल जाय । उस समय राजाने कहा—
“अनन्तवत्तु मे वित्तं यन्मे नास्ति हि किञ्चन मिथिलायां प्रदग्धायाम् न मे दद्याति किञ्चन ।”
मेरा आत्मरूप-धन अनन्त है । उसका अन्त कदापि नहीं हो सकता । इस मिथिलाके जलनेसे तो मेरा कुछ भी नहीं जल सकता ।
राजा जनकके इस वाक्यसे पदार्थोंमें उनको आसक्ति नहीं—अनासक्ति ही साबित होती है । अगर कोई मनुष्य, गृहस्थोंमें रह कर, स्त्री-पुत्र-धन प्रभृतिमें अनासक्त रहे, उनमें ममता न रक्खे, चाहे व्यवहार सब तरहके करे, वह सच्चा ज्ञानी है, उसको मोक्ष अवश्य होगी ।
ममता ही दुःखोंका कारण है । जिसकी किसी भी पदार्थ में ममता नहीं, उसे दुःख क्यों होने लगा ? उसकी ओरसे वह पदार्थ मिले तो अच्छा, न मिले तो अच्छा ; बचा रहे तो भला और नष्ट हो जाय तो भला । जिसकी जिस चीज़में ममता होती है, उसे उस चीज़के नाश होने या उसके न मिलनेसे अवश्य दुःख होता है । कहा है ।
यस्मिन् वस्तुनि ममता मम नायस्तत्र तत्रैव ।
यत्वेवाहमुदासे मुदा स्वभाव सन्तुष्टः ॥