भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४०८ )

राजा जनक और शुक्रदेव जी ।

एक बार व्यास जीने शुक्रदेव जीसे कहा कि, तुम राजा जनकके पास जाकर उपदेश लो । शुक्रदेव जी जनकके द्वार पर गये । भीतर खबर कराई, तो राजाने कहला भेजा कि, द्वार पर ठहरो । शुक्रदेव जी तीन दिन तक द्वार पर खड़े रहे, पर उन्हें क्रोध न आया । राजाने उनके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये ही, उन्हें, तीन दिन तक, द्वार पर खड़ा रक्खा और चौथे दिन अपने पास बुलाया । वहाँ जाकर शुक्रदेव जी क्या देखते हैं कि, राजा जनक सोनेके जड़ाऊ सिंहासन पर बैठे हैं, सुन्दरी नवयौवना स्त्रियाँ उनके चरण दाब रही हैं और कुछ मोरछल और पक्षु कर रही हैं । जगह-जगह विषय-भोग या ऐश-आरामके सामान घरे हैं । सामने ही सुन्दरी नर्तकियाँ नाच कर रही हैं । यह हाल देखकर, शुक्रदेव जीके मनमें राजाकी ओरसे घृणा हुई । उन्होंने मनमें कहा—“नाम बड़े और दर्शन छोटे” वाली बात है । यह तो भोगोंमें आसक्त है ; पिताजीने इन्हें परम ज्ञानी क्यों कहा ? राजा जनक शुक्रदेव जीके मनकी बात ताड़ गये । देवात ; उसी समय मिथिलापुरीमें जोरसे आग लग गई । बाहरसे दूत दौड़े आये और कहने लगे—“महाराज ! पुरीमें आग लग गई है और राजद्वार तक आ पहुँची है ।” शुक्रदेव जी मनमें सोचने लगे कि, मेरा

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