भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४११ )

उसने कहा—“भाई ! लड़का मर गया है । पहले सभाका काम कर ले ; तब सब मिल कर इसे श्मशान-घाट पर ले चलेंगे ।” मित्र लोग उस निर्मोही पिताकी बात सुनकर चकित हो गये । उन्होंने कहा—“तुम तो अजब आदमी हो ! तुम्हें अपने इकलौते जवान पुत्रका भी रक्ष नहीं ! उसने कहा—“भाई ! मेरा इसका क्या नाता ? हम सब सरायके मुसाफिर हैं । पूर्वजन्मके कर्मवश, एक दूसरेसे मिल गये हैं । अपना-अपना समय होनेसे, अपनी-अपनी राह चले जा रहे हैं ; इसमें रक्ष या शोककी बात ही क्या है ?” ऐसे ही मनुष्य, गृहस्थीमें रहकर भी, जन्म-मरणके फन्देसे छूटकर, मोक्ष लाभ करते और जीवनमुक्त कहलाते हैं ।

काम करो, पर मनको ईश्वरमें रखो ।

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अगर भगवान् कृष्णके कथनानुसार संसारके काम-धन्धे किये जाय, तोभी हर्ज नहीं ; पर मनको संसारी पदार्थों या विषय-भोगोंसे हटाकर एकमात्र भगवान्में लगाना चाहिये । दुनियाची काम करते रहने और मनको भगवान्में लगाये रहने से सिद्धि मिल सकती है । महाकवि रहीम कहते हैं :—

दोहा ।

जो “रहीम” मन हाथ है, मनसा कई किन जाहि । जलमें जो छाया परी, काया भीजत नाहि ॥