वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४१२ )
सारा द्वारमद्वार मन पर है। व्यवभिचारिणी ली धरके धन्धे किया करती है, पर मनको हर क्षण अपने थारमें रखती है। गाय जहाँ-तहाँ घास खरती-फिरती है, पर मनको अपने बन्धनेमें रखती है। स्त्रियाँ जब ध्यान कूटती हैं, तब एक हाथसे मूसल चढ़ाती हैं और दूसरेसे ओखलीके धानको ठीक करतो जाती हैं। इसी बौधमें यदि उनका बच्चा आ जाता है, तो उसे दूध भी पिलाती रहती है; किन्तु उनका ध्यान बराबर मूसलमें ही रहता है। अगर जूरा भी ध्यान टूटे, तो हाथके पल्लस्तर उड़ जायँ। इसी तरह मनुष्य, यदि संसारके काम-धन्धे करता हुआ भी, ईश्वरमें मन लगाकर उसकी भक्ति करता रहे, तो कोई हर्ज नहीं; उसे भगवत्-दर्शन अवश्य होगा। यद्यपि इस तरह संसारमें रहकर सिद्धि लाभ करना—है बड़े शूरवीरोंका काम; तोभी इस तरह अनेक लोग, गृहस्थोंमें रहते हुए भी, मोक्ष-पद पा गये हैं।
ईश्वर-प्राप्तिकी सहज राह कौनसी है ?
गृहस्थीमें रहने की अपेक्षा, गृहस्थी त्यागकर, वनके एकान्त भागमें रहकर, भगवत्में मन लगाना अवश्य आसान है।* गृहस्थीमें रहनेसे मन विषय-भोगोंकी ओर दौड़ता ही है। खीको देखनेसे काम जागता ही है; पर न देखनेसे मन नहीं चलता। पराशर ऋषिने मतस्यगन्धा देखी, तो उनका मन चलायमान हुआ। विश्वामित्रने मेनका देखी तो उनका मन