वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ४१२ )
सारा द्वारमद्वार मन पर है। व्यवभिचारिणी ली धरके धन्धे किया करती है, पर मनको हर क्षण अपने थारमें रखती है। गाय जहाँ-तहाँ घास खरती-फिरती है, पर मनको अपने बन्धनेमें रखती है। स्त्रियाँ जब ध्यान कूटती हैं, तब एक हाथसे मूसल चढ़ाती हैं और दूसरेसे ओखलीके धानको ठीक करतो जाती हैं। इसी बौधमें यदि उनका बच्चा आ जाता है, तो उसे दूध भी पिलाती रहती है; किन्तु उनका ध्यान बराबर मूसलमें ही रहता है। अगर जूरा भी ध्यान टूटे, तो हाथके पल्लस्तर उड़ जायँ। इसी तरह मनुष्य, यदि संसारके काम-धन्धे करता हुआ भी, ईश्वरमें मन लगाकर उसकी भक्ति करता रहे, तो कोई हर्ज नहीं; उसे भगवत्-दर्शन अवश्य होगा। यद्यपि इस तरह संसारमें रहकर सिद्धि लाभ करना—है बड़े शूरवीरोंका काम; तोभी इस तरह अनेक लोग, गृहस्थोंमें रहते हुए भी, मोक्ष-पद पा गये हैं।
ईश्वर-प्राप्तिकी सहज राह कौनसी है ?
गृहस्थीमें रहने की अपेक्षा, गृहस्थी त्यागकर, वनके एकान्त भागमें रहकर, भगवत्में मन लगाना अवश्य आसान है।* गृहस्थीमें रहनेसे मन विषय-भोगोंकी ओर दौड़ता ही है। खीको देखनेसे काम जागता ही है; पर न देखनेसे मन नहीं चलता। पराशर ऋषिने मतस्यगन्धा देखी, तो उनका मन चलायमान हुआ। विश्वामित्रने मेनका देखी तो उनका मन
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बिगड़ा। शिवने मोहिनी देखी, तो उनका मन चञ्चल हुआ। इसीलिये पहलेके अनेक महापुरुष अपने-अपने घर त्यागकर बनमें चले गये और वहाँ उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई। पर बनमें जाकर भी, जो मनको विषयों में लगाने रहते हैं, ममताको नहीं त्यागते; कामनाको नहीं छोड़ते, वे गृहस्थोंसे भी बुरे हैं। वे धोबीके कुत्तेकी तरह घरके न बाटके।
त्यागमें ही सुख है।
—○—
जो धन-दौलत, राजपाट, स्त्री-पुत्र प्रभृतिको त्याग कर बनमें रहते हैं; किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यहाँ तक कि, खानेके लिये पाव-भर आटेकी भी जरूरत नहीं रखते; जहाँ जगह पाते हैं वहाँ पड़ रहते हैं; जो मिल जाता है, उसीसे पेट भर लेते हैं,—वे सच्चमुच ही सुखी हैं। शङ्कराचार्य्य महाराजने “मोहमुद्गर” में कहा है—
सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः,
शय्याभूतलभजिनंवासः।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः,
कथ्य सुखं न करोति विरागः ॥
जो देवमन्दिर या पेड़के नीचे पड़े रहते हैं, ज़मीन ही जिनकी चारपाई है, मुगड़ाला ही जिनका वस्त्र है, सारे विषय-
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भोगके सामान जिन्होंने त्याग दिये हैं ; यानी वासना-रहित हो गये हैं,—ऐसे किन मनुष्योंको सुख नहीं है? अर्थात् ऐसे त्यागी सदा सुखी हैं।
देहके नहीं मनके वैराग्यसे लाभ है।
— * —
अनेक लोग गेहूँ कपड़े पहन लेते हैं, लम्बी-लम्बी मालाये गलेमें डाल लेते हैं, लिलक-छापे या राख लगा लेते हैं ; पर उनका मन सदा भोगोंमें लगा रहता है। वे शरीरको वैरागियोंका सा बना लेते हैं ; पर मन उनका भोगियोंका सा रहता है ; इसलिये उनका जन्म नृश जाता है। आजकल साधू-संन्यासी बनना एक प्रकारका रोज्गार हो गया है। जिनसे किसी तरहकी मिहन्त-मत्तदूरी नहीं होती, वे साधु-वेध बनाकर लोगोंको ठगते और घर मनी-बाडर भेजते हैं। बहुतसे लोगों नगरोंमें आकर बड़े आदमियोंके यहाँ डरे लगा देते हैं, चेड़े-बैठियोंसे भेंट लेते हैं, नवयौवना सुन्दरियोंको पास बैठाकर उपदेश देते हैं, अपने क्रदमोंमें रुपये और अशक्तियोंके हेर लगवाते हैं। भला ऐलोंका मन परमात्मामें लग सकता है? जब विश्वाभिन्न और पराशर जैसे, हवा और पानी पर गुज़ारा करनेवाले, मुनियोंका मन स्त्रियोंको देखते ही चञ्चल हो गया ; तब रबड़ी-मलाई और मावा-मोहनभोग उड़ाने
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बालोंका मन कैसे स्वियोंपर न चलेगा ? ऐसा कौन है, जिसका मन स्वियोंने खण्डित नहीं किया ? कहा है—
कोऽर्थान् प्राप्य न गर्विता ?
विषमिषः कस्यापदो नागता : ?
क्षीमिः कस्य न खण्डितं सुवि मनः ?
को नाम राज्ञां प्रियः ?
कः कालस्य न गोबरान्तरगतः ?
कोऽर्थी गतो गौरव ?
को वा दुर्जन-वागुग्रा-निपतितः
क्षेमेण यातः पुमान् ?
किसको धन पाकर गर्व नहीं हुआ ? किस विषयी पर आफ़्त नहीं आई ? पृथ्वी पर किसका मन नारीने आकृष्ट नहीं किया ? कौन राजाओंका प्यारा हुआ ? कौन कालकी नजरसे बचा ? किस मँगतेका गौरव हुआ ? कौन सज्जन दुष्टोंके जालमें फँसकर कुशलसे रहा ?
संन्यासियोंको स्त्री-दर्शन भी मना है ।
धर्मशास्त्रमें लिखा है :—
सम्भाषयेत् क्षिप्रं तैव, पूर्वदृष्टं च न स्मरेत् । कथां च वजयेत्तासां, नो पर्येक्षिष्वितामपि ॥
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यस्तु प्रवजितो भूत्वा पुनः सेवेतु मैथुनम् ।
षष्ठिवर्षसहस्राणि विष्णुयां जायते क्रुमिः ॥
यतिको स्त्रीसे बात न करनी चाहिये, पहलेकी देखी हुई स्त्रीकी याद न करना चाहिये तथा स्त्रियोंकी चर्चा भी न करनी चाहिये और स्त्रीका चित्र भी न देखना चाहिये ।
जो संन्यासी होकर स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ६० हजार वर्ष तक विष्णुका कीड़ा होता है ।
और विषयोंसे मनको रोकना उतना कठिन नहीं, जितना कि स्त्रीसे रोकना कठिन है ; इसीसे स्त्रीका चित्र तक देखनेकी मनाही की है । जो ढोंगी साधु-सन्यासी दुनियादारोंके घर आते और स्त्रियोंमें बैठे रहते हैं, उनको उपदेश ग्रहण करना चाहिये ।
ढोंगी साधुओंके लिये अमूल्य उपदेश ।
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बनावटी या ढोंगी साधुओंके सम्बन्धमें महात्मा तुलसी- दासजीने कहा है :—
तनको योगी सब करें, मनको विरला कोय ।
सहजे सब सिधि पाइये, जो मन योगी होय ॥१॥
जाके उर बर वासन्य, भई भास कछु आन ।
तुलसी ताहि बिड-बना, केहि बिधि कथहि प्रमान ॥२॥
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काह भयो बन बन फिरे, जो बनि आगो नाहिं । बनते बनते बनि गयो, तुलसी घर ही माहिं ॥३॥ रामचरण परचे नहीं, बिन साधन पद-नेह । मुँड़ मुड़ायो बादिही, भाँड़ भये तजि गेह ॥४॥ कीर सरस वाणी पढ़त, चाखत चाहन खोंड़ । मन राखत वैराग महँ, घरमें राखत राँड़ ॥५॥ जहाँ काम तहँ राम नहीं, जहाँ राम नहीं काम । तुलसी दोनों नहीं मिलें, रवि रजनी इक ठाम ॥६॥ तब लगि योगी जगत्-गुरु, जब लगि रहै निरास । जब आशा मनमें जगी, जग गुरु योगी दास ॥७॥
( १ )
शरीरको योगी बहुत लोग करते हैं ; पर मनको कोई विरला ही योगी करता है ; अगर मन योगी हो जाता है ; तो सहजमें सिद्धि या मोक्ष मिल जाती है । दूसरे शब्दोंमें यों समझिये कि, लोग शेष तो संन्यासी-महात्माओंकासा कर लेते हैं ; पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है ; इसलिये उनको कुछ भी लाभ नहीं होता,—सिद्धि नहीं मिलती । अगर वे लोग शरीरको चाहे गृहस्थोंकासा रखें, उत्तमसे उत्तम खाने खाद्य, बढ़ियासे बढ़िया कपड़े पहने ; पर मनमें स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, नाच-रङ्ग आदिकी वासना और ममता न रखें ; तो उन्हें निश्चय ही सिद्धि मिल
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सकती है। मतलब यह कि, मनके योगी होनेसे सिद्धि मिलती है; कपड़े रँगने, माथा मुँडाने और डण्ड-कमण्डल प्रभृति रखनेसे सिद्धि नहीं मिलती।
( २ )
जिसके विशुद्ध हरि-भक्तिपूर्ण हृदयमें काम, लोभ और मोह प्रभृतिकी वासना पैदा हो जाती है, वह अपनी वासना पूरी करनेके लिये, नाना प्रकारके नोच कर्म करता है; फिर उसकी जो कृतीती और बदनामी होती है, उसका यथार्थ रूपमें वर्णन करना कठिन है। मतलब यह है कि, जिसके हृदय में केवल एक भगवान्को वासना होती है, उसका हृदय श्रेष्ठ और विशुद्ध समझा जाता है। यदि उसके हृदयमें इसके सिवा—भगवान्के अतिरिक्त और वासना उत्पन्न हो उठती है, उसका दिल धन-दौलत, स्त्री और राजपाट प्रभृतिपर चलायमान हो जाता है; तो उसकी संसारमें बड़ी बदनामी होती है। सारांश यह कि, यदि कोई संन्यासी, यति या हरिभक्त विषयोंको त्याग कर फिर विषयोंके जालमें फँसता है, राँड रखता है, इत्र फुलेल लगाता है, मलमल-खासा पहनता है और गद्दे तकियोंपर आराम करता है; तो उसकी वर्णनातीत अपकीर्ति होती है।
( ३ )
अगर कोई शस्त्र घर छोड़ कर और संन्यासी का भेष बना कर बन-बन फिरता है; पर उसका मन भगवान्में नहीं लगता, तो उसके घर छोड़ने और तकलीफ उठानेसे कोई लाभ नहीं।
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वह वैरागी तो बन जाता है, भेष तो संन्यासियों का सा घर लेता है ; पर उसका मन विषयोंमें लगा रहता है ; इसलिये वह धोबीके कुत्तेकी तरह घर और घाद कहीं का नहीं रहता ; लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो घरमें ही रहते हैं ; पर सत्संग करते और हरि-यश सुनते हैं। वे सत्सङ्ग के प्रभाव और गुरुकी व्यासे, विषयोंसे मनको हटाकर, ईश्वरके गुणगान करने लगते हैं। फिर ; धीरे-धीरे उनकी भक्ति ईश्वरमें बढ़ जाती है और वे सच्चे भक्त हो जाते हैं। अनेक लोग घरमें ही रहकर इस तरह सिद्धि लाभ कर चुके हैं। सारंगि यद, विषयोंसे मन खींच लेनेवाला, ममता और वाहना न रखने वाला गृहस्थ भला ; पर विषयोंमें मन रखनेवाला, ममता और वासनाको न त्यागने वाला त्यागी संन्यासी भला नहीं।
( ४ )
जिनका भगवान्के चरण-कमलोंमें सच्चा प्रेम नहीं है, जिनका हरिभक्तिके साधन—सन्तोंके वरणोंमें नेह नहीं है, जो महात्माओंकी सङ्कृति और पदचन्द्रना नहीं करते, वे वृथा ही घर छोड़, सिर मुँडा, भेष बदल कर भाँड़ हो गये हैं।
भाँड़ जिस तरह लोगोंको रिझाने और रुपया कमानेके लिये अनेक प्रकारके खाङ्ग धरते हैं ; उसी तरह आज-कल बहुतसे लोग रुपया कमाने और अपने तर्ज पुजवानेको संन्यासियोंका सा भेष बनाते हैं। • ये न तो भगवान्को जानते हैं और न उसके जाननेके लिये महात्माओंकी सङ्कृति और उनकी
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सेवा ही करते हैं। उन्हें सिर मुड़ाने, गेहूण कपड़े पहनने और घर त्यागने से कोई लाभ नहीं।
( ५ )
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो घर-गृहस्थीमें रहते हैं और शरीरसे अपने कुलके व्यवहार करते हैं; पर मनको सब ओरसे खींचकर, ममताको त्याग कर, उसे परमात्मामें लगाने हैं। प्रह्लाद और अम्बरीष प्रभृति ऐसे ही भक्त हो गये हैं। कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो तन और मन दोनोंसे ही ईश्वरकी भक्ति और उपासना करते हैं। नारद और शुक्रदेवकी गणना ऐसों में ही है। इन्होंने घर त्यागकर हरिभक्ति की। कुछ ऐसे लोग होते हैं कि, जो लोगोंको विभाने और हलवा-पूरी तथा खीर-खाँड़ उड़ानेके लिए, वेदान्त और पुराणोंको सीख लेते हैं और तोतेकी तरह मोठी-मोठी बातें बनावते हैं। सीधे-सादे भौद्ध लोग उनकी बातों पर रीक्ष कर, उन्हें रबड़ी-मलाई और मोहन-भोग खिलाते हैं। इन भालों के खानेसे जब कामदेव जोर करता है; तब काम शान्तिके लिये, ये लोग इधर-उधरसे व्यभिचारिणी दुष्टाओंको उड़ा लाकर घरमें रख लेते हैं। मनमें झमझते हैं, हम वैराग्यवान् हैं और इस अभिमानमें चूर भी रहते हैं। स्वयं जगतसे पुजना चाहते हैं; पर आप घरमें रक्खी हुई राँड़को पूजते हैं। ऐसोंका मानव-जन्म कृथा नष्ट होता है।
( ६ )
जो कामी या स्त्री-लोलुप होते हैं, उनका मन भगवान्में
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नहीं लग सकता ; पर जो सच्चे ईश्वर-भक्त होते हैं, वे विषय-भोग और स्त्रियोंका नाम तक नहीं लेते। विषयी पुरुषोंसे हरि-भक्ति नहीं हो सकती और हरि-भक्तों से स्त्री नहीं भोगी जा सकती। जिस तरह सूरज और रात अथवा दिन और रात एकत्र नहीं हो सकते ; उसी तरह राम और काम दोनों एकत्र नहीं हो सकते। मतलब यह है, जिन्हें ईश्वरके दर्शन करने हों, जिन्हें परमपद या सिद्धि प्राप्त करनी हो, वे स्त्रियोंके दर्शन, उनकी चर्चा और उनके चित्रों तक से बचें ; क्योंकि ईश्वर-प्राप्तिमें स्त्री एक खाईके समान है।
( ७ )
जब योगीके मनमें आशा नहीं रहती, उसे किसीसे कुछ चाहना नहीं रहती, तब योगी जगत्का गुरु होता है ; लेकिन जब योगीके मनमें आशा-तृष्णाका उदय होता है, जब योगी किसीसे कुछ चाहता है, तब योगी चेला हो जाता है और जगत् उसका गुरु हो जाता है ; यानी जगत् उसकी निन्दा करता और उसे नसीहत देता है। मतलब यह, सच्चे योगियों को किसी भी पदार्थकी चाहना नहीं होती ; अतः वे जगत्को इतनेके के सम्मान तुच्छ समझते हैं ; पर वासना या इच्छा रखनेवाले जगत् की खुशामद करते और इस तरह संसारी आदमियोंसे छोटे बनते हैं।
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कोरा सन्यासी-भेष धारना, नरकके सामान करना है ।
आजकल अनेक वेद-विरुद्ध काम करनेवाले, मनगढ़न्त मत चलानेवाले, झूठ बोलनेवाले, बगुला और बिलाव की सी वृत्ति रखनेवाले फिरते हैं । ग्रहस्थोंको चाहिये कि, उनका बातोंसे भी सत्कार न करें । ठगोंका सत्कार होनेसे ही ठग-साधु बढ़ रहे हैं । उनमेंसे कोई मूर्ति बनाकर पूजता और पुज-वाता है । कोई अपनेको कबीरपन्थी, कोई तानकपन्थी, कोई रामानुजी और कोई दादूपन्थी कहता है । इन पन्थोंसे कोई लाभ नहीं । जब तक 'आत्मज्ञान' नहीं होता, तब तक सिद्धि या मोक्ष नहीं मिलती ; अतः मनको, सब तरफसे हटाकर, आत्मचिन्तनमें लगाना चाहिये । ढोंग करनेसे मनुष्य-जन्म वृथा जाता है । काम तो सब यतियों के से किये जाते हैं, कष्ट भी उन्हींकी तरह उठाये जाते हैं ; पर परिणाममें मिलता कुछ भी नहीं । बिना आत्मज्ञान या ब्रह्मविचार के कल्याण नहीं होता । ग्रहस्थोंको भी चाहिए कि, ऐसे ठगोंका आदर-सम्मान न करें । ऐसे बनावटी साधु-संन्यासी आप नरकमें जाते और अपने शिष्योंको भी नरकमें घसीट ले जाते हैं ।
किसीने ठीक यही बात कबितामें बड़ी खूबीसे कही है :—
आत्मभेद बिन फ़िरें भटकते, सब धोखेकी टाटीमें ।
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कोई धातुमें ईश्वर मानत, कोई पत्थर कोई माटीमें । वृक्ष कोई जलमें कोई, कोई जड़्याल कोई वाटीमें । कोई तुलसी खड़ाक्ष कोई, कोई मुद्रा कोई लाठीमें । भगत कबीर कोई कह नानक, कोई शंकर परिपाटीमें । कोई नीमार्क रामानुज है, कोई बह्रम परिपाटीमें । कोई दाढ़ू कोई गरीब दासी, कोई गेरु रंगकी हाटीमें । कहै “आजाद” सेष जो धारे, चले नरक की भाटीमें ॥
संन्यासी एक जगह न रहे ।
संन्यासीका मन किलीकी प्रीतिमें न फँस जाय अथवा किलीसे उसकी मुहब्बत न हो जाय ; इसलिये धर्मशास्त्रमें संन्यासियोंको एक दिनसे ज़ियादा एक गाँवमें रहना तक मना लिखा है। कहा है :—
( ४२४ )
आबे दरिया बहे तो बेहतर, इन्हीं रवा रहे तो बेहतर । पानी न बहे तो उसमें दुर्गन्ध आये । खजूर न चले तो मोर्चा खाये ॥
गिरिधर कवि कहते हैं :—
कुण्डलिया ।
( १ )
बहता पानी निर्मिला, पड़ा गन्ध सो होय । त्यों साधू रमता भला, दाग न लागे कोय ॥ दाग न लागे कोय, जगतसे रहे अलहदा । राग-द्वेष युग त्रेत, न चितको करें बिच्छेदा ॥ कह “गिरिधर” कविराय, शीत उष्णादिक सहता । होय न कहूँ आसक्त, यथा गंगा-जल बहता ॥
( २ )
रहनेो सदा इकतको, पुनि भजनेो भगवन्त । कथन श्रवण अद्वैतको, यही मतो है सन्त ॥ यही मतो है सन्त, तत्वको चितवन करनेो । प्रत्यक् ब्रह्म अभिन्न, सदा उर अन्तर धरनेो ॥ कह “गिरिधर” कविराय, ब्रह्मन दुर्जनको सहनेो । तजके जन-समुदाय, देश निर्जनमें रहनेो ॥
( ४२५ )
संन्यासियोके कर्तव्य कर्म ।
( यति पञ्चकसे )
वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो, भिक्षावमात्रेण च तुष्टिमन्तः । विशोकमन्तः करणे रमन्तः, कौपीनवतः खलु भाग्यवन्तः ॥
( २ )
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः, पारिण्डयं भोक्तुममन्त्रयन्तः । कल्यामिव श्रीमपि कुत्सयेतः, कौपीनवतः खलु भाग्यवतः ॥
( ३ )
देहादिभावं परिवर्चयन्तः, आत्मानमात्मन्यवलोकयन्तः । नान्तं न मध्यं न वहिः स्मरन्तः, कौपीनवतः खलु भाग्यवतः ॥
( ४ )
स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः, सुशान्त सर्वेन्द्रियतुष्टिमन्तः ।
( ४२६ )
अहर्निश ब्रह्मसुखे रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥
( ५ )
पञ्चाक्षरं पावनमुच्चरन्तः; पतिं पशुनां हृदि भावयन्तः । भिद्वाशिनी दिक्षु परिभ्रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥
भावार्थ ।
( १ )
वेदान्त वाक्य या उपनिषद्मै अथवा ब्रह्मविद्यामें मन लगाये रहनेवाला, केवल शिक्षाके अन्तसे सन्तुष्ट रहने वाला, मनको शोक-ताप-शून्य करके सन्तुष्ट रहनेवाला और कौपीन पहनने वाला योगी भाग्यवान् है ।
( २ )
केवल वृक्षके मूलमें आश्रय लेनेवाला, दोनों हाथोंको भोजनके लिये न लगानेवाला, आत्मशुद्धाचा की तरह लक्ष्मी की निन्दा करनेवाला अर्थात् अपनी तारीफ और धनसे दूर रहने वाला, एवं कौपीन धारण करनेवाला योगी सुखी है ।
( ३ )
सुखासक्ति—वासनाको त्यागनेवाला, अपने स्वरूपमें
( ४२७ )
औरोंको देखनेवाला, अन्त, मध्य और पुत्रकलत्रादिको न याद करनेवाला एवं कोपीन बाँधनेवाला यति भाग्यवान् है।
( ४ )
अपने आत्माके ही आनन्दमें मग्न रहनेवाला, आँख कान नाक जीभ प्रभृति इन्द्रियोंके विषय-सुखोंके त्यागनेसे सन्तुष्ट और आत्मसाक्षात्कारसे खुश रहनेवाला एवं दिन-रात ब्रह्मके दर्शनोंसे पैदा हुए आनन्दमें रहनेवाला तथा कोपीन पहनने वाला योगी सुखी है।
( ५ )
“शिवाय नमः” इस पाँच अक्षरके, आत्माको शुद्ध करने वाले, भवका उन्चारण करनेवाला, हृदयमें पशुपति शङ्करकी भावना करता हुआ, भिक्षात्र पर गुजारा करके, दिशाओंमें घूमनेवाला और कोपीन धारण करनेवाला योगी भाग्यवान् है।
यतिपञ्चकका फल ।
वास्तविक महापुरुष होनेकी इच्छा रखनेवालोंको उपरोक्त “यतिपञ्चक” कण्ठाग्र कर लेना और इस पर अमल करना चाहिये ; तब उन्हें निश्चय ही शान्ति और सिद्धि मिलेगी।
छप्पय ।
शतहि वर्षकी आयु, रातमें वीतत आये ।
ताके आये आय, वृद्ध बालकूपन साधे ॥
( ४२८ )
रहे यहै दिन, आधि व्याधि ग्रहकाज समोये । नाना विधि बकवाद करत, सबहिनको खोये ॥ जलकी तरंग बुदबुद सदश, देह खेह हूये जात है । सुख कहो कहौं इन नरनकौं, जासों फूलत गात है ॥१०७॥
107. The average longevity of a man is estimated at hundred years. Half of it passes away in nights. Of the remainder one portion is spent in childhood and another in old age. What finally remains is led with hardship caused by disease and separation in other people's service etc. Where is the happiness for living beings in a life which is as restless as the currents of water ?
ब्रह्मज्ञानविचेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं
यन्मुच्यतेपुण्यभोगकांचननान्येकांततो निःस्पृहाः ॥
न प्रातानि पुरा न संपति न च प्राप्नो ददृमत्ययो
वाञ्छामात्रपरिग्रहाणयपि परं त्यक्तुं न शक्त वयम् ॥१०८॥
उन बुद्धिमान, निर्मल ज्ञानवाले, ब्रह्मज्ञानियोंका कठिन व्रत देखकर हमें बड़ा विस्मय होता है, जो विषय-भोग, धन-दौलत, सोना-चाँदी और स्त्री-पुत्र प्रभृति को एकदम से त्याग देते हैं और फिर उनकी इच्छा नहीं रखते ॥१०८॥
सत् और असत्का विचार करनेवाले, देह और आत्माको अलग-अलग समझनेवाले, इस संसारको खप्रवत माननेवाले,
( ४२६ )
इस जगत्की झूठी चमक-दमक पर मोहित न होनेवाले पुरुष “ज्ञानी” कहलाते हैं। जिनके सामनेसे मायाका पर्दा हट जाता है, जिन्हें देहके नाशमान और आत्माके नित्य और अविनाशी होनेका ज्ञान हो जाता है, उन्हें परमात्मा दीखने लगता है। उन्हें परमात्मा के ध्यानमें जो आनन्द आता है, उसकी बराबरी त्रिभुवनके सारे सुखेश्वर्य भी नहीं कर सकते। ऐसे ज्ञानी इस जगत्से नाता क्यों जोड़ने लगे ? जब तक उन्हें ज्ञान नहीं होता ; मायाका पर्दा उनकी आँखोंके सामनेसे नहीं हटता, शरीर और आत्माका भेद मालूम नहीं होता, तभी तक वे इस संसारी जालमें फँसे रहते हैं ; जहाँ उन्हें ज्ञान हुआ, और उन्होंने संसारीकी असलियत समझी, तहाँ फौरन ही इसे छोड़ा। एकबार छोड़कर, फिर इसकी इच्छा वे इसलिये नहीं करते, कि वे समझ-बूझ कर इसे छोड़ते हैं ; जबर्दस्ती या किसीके बहकाने से अथवा दूकान्दारी के लिए तो वे इसे छोड़ते ही नहीं, जो उनकी लालसा इसमें बनी रहे।
जो लोग रुपया पैदा करने या पुजनेके लिए घर-गृहस्थी को छोड़ते हैं, उनका मन संसारके विषय-भोगोंमें लगा रहता है। वे न तो इधरके ही रहते हैं और न उधरके ही। वे “घुओबी का कुत्ता घरका न घाटका” अथवा “खुदाही मिल्ला न विसाले सनम” या “दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम” वाली कहावतोंको चरितार्थ करते हैं। ऐसे कच्चे त्यागियोंके सम्बन्ध में गोस्वामि तुलसीदास जी कहते हैं :—
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इत कुल की करनी तजे, उत न भजे भगवान । तुलसी अथवर के भये, ज्यों बघूर को पान ॥
अर्थात् इधर तो वे अपना घरबार और स्त्री-पुत्र तथा अपने कुलके कामोंको छोड़ बैठते हैं और उधर भगवान्को भी नहीं भजते । वे हवाके बण्डर या भभूलेमें चकर खानेवाले पत्तेकी तरह अथवरमें ही चकर खाते रहते हैं ।
अगर वे अपने घरमें ही रहते, तो अपने कुल-वर्णके अनुसार कर्म करते और महात्माओंकी संगति तथा उनकी सेवा-दहल से संसारकी असारता, अपने नातेदारोंको स्वार्थपरता एवं ईश्वरकी महिमाका ज्ञान लाभ करके, ईश्वरकी भक्ति करते हुए, प्रह्लाद, जनक और अम्बरीष प्रभृतिकी तरह, घरमें रहकर ही, सिद्धि लाभ करते । नादान लोग, बिना पूर्ण वैराग्य और ज्ञानके, धरगृहस्थीको छोड़कर वनमें चले तो जाते हैं ; पर उनकी वासना—ममता अपने घर वालों अथवा पराई स्त्रियों या धन-दौलतमें बनी ही रहती है ; इसलिये वे संसारियोंकी निन्दाके भयसे लुक-छिपकर विषयोंको भोगते और परमात्मामें मग्न नहीं लगाते । इस तरह उनके लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं—वे न तो संसारी सुख ही भोग सकते हैं और न स्वर्ग या मोक्ष ही लाभ कर सकते हैं । सारांश यह, मनुष्यको संसारसे पूरी विरक्ति होनेपर संन्यास लेना चाहिये और एकबार त्यागी बन कर फिर अत्यागी न बनना चाहिये । त्यागी होकर विषयों
( ४३१ )
में ठालसा रखने वाले महा नीच हैं। उनकी श्रोंनों जहानमंघोर दुग्गति होती है।
प्रत्येक मनुष्यको समझना चाहिये कि, यह संसार वास्तव में ही माया-जाल है। यहाँ कोई किसीका नहीं है। सब अपना-अपना मतलब गाँठते हैं। मतलब नहीं, तो कोई किसीका नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं :—
तुलसी स्वारथके सगे, विन स्वारथ कोई नाहीं ।
सरस वृक्ष पंछी बसें, निरस भये उड़ जाहि ॥
सभी स्वार्थके सगे हैं; बिना स्वार्थ कोई किसीका नहीं है। जबतक वृक्षमें फल रहते हैं, तभी तक पंछी उस पर रहते हैं; जहाँ वृक्ष फलहीन हुआ, कि वे उसे छोड़कर और जगह उड़ जाते हैं। यही हाल संसारका है। सब बड़े दमका मेला है। सभी जीते जीके साथी हैं; मरतेही सारी मुहब्बत उड़ जाती है। जो स्त्री अर्द्धाङ्गी कहलाती है, जो पुरुषको अपना आणप्यारा कहती है, उसे गलेसे लगाती है और उसके लिये जान तक देनेको तैयार रहती है, दम निकलते ही उससे डरने या भय खाने लगती है। अगर वह रोती भी है, तो अपने सुखोंके लिए रोती है; उसके लिए नहीं रोती। और कुटुम्बी—माता-पिता बहिन भाई इत्यादि भी दम निकलते ही कहने लगते हैं,—“जबही उठाओ, अब घरमें रखना ठीक नहीं।”
इस मौकेकी एक कहानी हमें याद आई है। उसे हम पाठकोंके उपकारार्थ नीचे लिखते हैं :—