भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बिगड़ा। शिवने मोहिनी देखी, तो उनका मन चञ्चल हुआ। इसीलिये पहलेके अनेक महापुरुष अपने-अपने घर त्यागकर बनमें चले गये और वहाँ उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई। पर बनमें जाकर भी, जो मनको विषयों में लगाने रहते हैं, ममताको नहीं त्यागते; कामनाको नहीं छोड़ते, वे गृहस्थोंसे भी बुरे हैं। वे धोबीके कुत्तेकी तरह घरके न बाटके।

त्यागमें ही सुख है।

—○—

जो धन-दौलत, राजपाट, स्त्री-पुत्र प्रभृतिको त्याग कर बनमें रहते हैं; किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यहाँ तक कि, खानेके लिये पाव-भर आटेकी भी जरूरत नहीं रखते; जहाँ जगह पाते हैं वहाँ पड़ रहते हैं; जो मिल जाता है, उसीसे पेट भर लेते हैं,—वे सच्चमुच ही सुखी हैं। शङ्कराचार्य्य महाराजने “मोहमुद्गर” में कहा है—

सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः,

शय्याभूतलभजिनंवासः।

सर्वपरिग्रहभोगत्यागः,

कथ्य सुखं न करोति विरागः ॥

जो देवमन्दिर या पेड़के नीचे पड़े रहते हैं, ज़मीन ही जिनकी चारपाई है, मुगड़ाला ही जिनका वस्त्र है, सारे विषय-