भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ३६६ )

रही थी। उन्हें देखकर वह डरके मारे रक्षाका स्थान खोजने लगा। उसने एक अन्धा कूआ देखा, जिसमें घास छा रही थी तथा अनेक प्रकारकी बेले लग रही थीं। वह एक बेलको पकड़ कर, औंघा सिर किये, कूप में लटक गया। थोड़ी देर बाद उसने नीचेकी ओर देखा, तो एक बड़ा भारी सर्प मुँह फाड़े हुए नज़र आया; ऊपरकी ओर देखा, तो एक मस्त हाथी खड़ा दीखा। उस हाथीके छः मुख थे। उसका आधा शरीर सफेद और आधा काला था। जिस बेलको वह ब्राह्मण पकड़े हुए था, उसको वह हाथी खा रहा था और सफेद तथा काले दो चूहे उस बेलकी जड़को काट रहे थे।

इसका मतलब यों है :—वह ब्राह्मण जीव है। सघन वन यह संसार है। काम क्रोध आदि भयानक जीव इस जीवके नष्ट करनेको घूम रहे हैं। स्त्री-रूपी पिशाचिनी, भोग-रूपी पाश लेकर, इस जीवके फँसानेके लिये फिरती है। कूप में जो बेल लटक रही है, वही आयु है। उसीको पकड़कर यह जीव लटक रहा है। कूप में जो कालसर्प है, वह इस जीव का काल है, वह अपनी घात देख रहा है; ऊपर रात-दिन रूपी चूहे इस आयु रूपी बेलकी जड़ काट रहे हैं। वह हाथी वर्ष है। उसके छः मुख छः मृत्यु हैं। शुक्र और कृष्ण दो पक्ष उस हाथीके वर्ण या रंग हैं। मनुष्य इस तरह मौतके मुँहमें है। हर क्षण मौत उसे निगलती जा रही है; पर आश्चर्य्य है कि, इस आफतमें भी—मृत्यु-मुखमें, पड़ा हुआ भी—वह

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अपनेको सुखी सम्भक्ता है और इस नितान्त भयपूर्ण जीवनसे सन्तुष्ट है !

बीत गई सो बीत गई, आगेकी सुवि लो !

बहुतसे लोग कहा करते हैं, कि हमने सारी उम्र परपीड़न या पापकर्मोंमें खोई; भगवान्‌को कभी भूलसे भी याद न किया ; अब हम क्या कर सकते हैं ? यह कहना भारी भूल है । जो समय बीत गया, वह तो लौट कर आवेगा नहीं ; पर जो समय हाथमें है, उसे तो सुकर्म और ईश्वरकी यादमें लगाना चाहिये । यदि बाकी उम्र भी व्यर्थके भ्रमकटोंमें गँवाई जायगी, तो अन्तकालमें भारी पछतावा होगा । किसी कविने ठीक ही कहा है—

पुत्र कलत्र सुमित्र चरिल, धरा धन धाम है बन्धन जीको । बारहिँ बार विषैफल खात, अघात न जात सुधारस फीको । आन श्रोसान तजो अभिमान, कही सुन, नाम भजो सिय-पीको । पाय परमपद हाथ सों जात, गई सो गई, अब राख रही को ।

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एक नटकी उपदेशपद कहानी ।

एक राजा बड़ा ही कञ्जूस था। उसने प्रचुर धन सञ्चय किया था; पर उससे न तो वह अपने पुत्रको सुख भोगने देता था और न स्वर्गके डरसे अपनी कन्याकी शादी ही करता था। एक दिन एक नट-नटी उसके दरबारमें आये और राजासे तमाशा देखनेकी प्रार्थना की। राजाने कहा—“अच्छा, अमुक दिन देखा जायगा।” नटनी बार-बार याद दिलाती रही और राजा बारबार-टालता रहा। अन्तमें नटनी ने वजीरसे कहा—“अगर राजा साहब तमाशा न देखें, तो हम चले जायें; हमें स्वर्ग खाते बहुत दिन हो गये।” यह सुन वजीरने राजासे कहा—“महाराज! आप तमाशा देख लीजिये। हम लोग चन्दा करके नटको कुछ दे देंगे। अगर आप तमाशा न देखेंगे, तो बड़ी बदनामी होगी।” राजा इस बात पर राजी हो गया। तमाशा हुआ। तमाशा करते-करते जब दो घड़ी रात रह गई और राजाने कुछ भी इनाम न दिया, तब नटनीने नटसे कहा :—

रात घड़ी भर रह गई, थाके पिप्पर आय ।

कह नटनी सुन मालदेह, सधुरा ताल बजाय ॥

नटनीकी बात सुनकर नटने कहा :—

२६

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बहुत गई थोड़ी रही, थोड़ी भी अब जाय।

कहे नाट सुन नायिका, तालमैं भंग न पाय ॥

एक तपस्वी भी वहाँ तमाशा देख रहा था। उसने ये सवाल-जवाब सुनते हो नट-जो अपना कम्बल दे दिया, राजाके लड़केने उसे अपनी हीरोंकी जड़ाऊ कड़ाँकी जोड़ी दे दी और राजकन्याने अपने गलेका हीरोंका हार दे दिया।

राजा यह सब देखकर चकित हो गया। उसने सबसे पहले तपस्वीसे पूछा—“तुम्हारे पास यही एक कम्बल था। तुमने क्या समझ कर उसे कम्बल दे दिया?” तपस्वीने कहा—“आपके ऐश्वर्य्यको देखकर मेरे मनमें भोगोंकी वासना उठ खड़ी हुई थी; पर नटके दोहेसे मेरा विचार बदल गया। मैंने उससे यह उपदेश ग्रहण किया कि, बहुत सी आयु तो तप में बीत गई; अब जो थोड़ीसी रह गई है, उसे भोगोंकी वासनामें क्यों खराब करूँ? मुझे नटसे उपदेश मिला, इससे मैंने अपना एकमात्र कम्बल—अपना सर्वस्व उसे दे दिया।”

इसके बाद राजाने राजपुत्रसे पूछा—“तुमने क्या समझकर अपनी वेशकीमत्त कड़ाँकी जोड़ी उसे दे दी?” राजपुत्रने कहा—“मैं बड़ा दुखी रहता हूँ, क्योंकि मुझे आप कुछ भी खर्च करने नहीं देते। दुखी होकर मैंने यह विचार कर रखा था कि, किसी दिन राजाको विष देकर मरवा दूँगा; पर इस नटके दोहेसे मुझे यह उपदेश हुआ है कि, राजाकी बहुत सी

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आयु तो बीत गई, अब वह बूढ़ा हो गया है ; दो-चार बरसकी बात और है ; इस अंतमें वह आपही मर जायगा, अतः पितृहत्या क्यों की जाय ? इसी उपदेशके बदलेमें मैंने नटको कड़ोंकी जोड़ी दे दी ।”

फिर राजाने राजकन्यासे पूछा—“तुमने अपना क्रौमता हार नटको क्यों दिया ?” कन्याने कहा—मेरी जवाननी आ गई है ; आप स्वर्चके भयसे मेरो शादी नहीं करते । कामदेव बड़ा बलवान है । कामकी प्रबलताके मारे, मेरा चिवार वजीरके लड़केके साथ निकल भागनेका था ; पर नटके दोहेसे मुझे यह उपदेश मिला कि, राजाकी बहुवसी आयु तो चली गई ; अब जो शेष रह गई है, वह भी बीतने ही वाली है । थोड़े दिनोंके लिये, पिताके नाममें क्यों बड़ा लगाऊँ ? यह अनमोल उपदेश मुझे नटके दोहेसे मिला, इसी से मैंने अपना बहुव्यय हार उसे दे दिया । हे पिता ! नटके दोहेसे आपकी जान और इज्जत बचाई है ; अतः आपको भो उसे कुछ इनाम देना चाहिये ।” राजाने सब बातें सोच-समझ कर नटको इनाम दे विदा किया और वजीरके लड़केके साथ कन्याको शादो कर दी । राजगुरुको गद्दो देकर आप बेरागी हो गया और अपने शेष रही आयु आत्मविचारमें लगा दी । इसी तरह सभी संसारियोंको, अपनी शेष आयु सुखमें और ब्रह्मविचारमें लगा, जन्म-मरणसे पीछा लुड़ा, नित्य सुख-शान्ति लाभ करनी चाहिये ।

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बाल-बच्चोंका क्या किया जाय ।

प्रथम तो स्त्री-पुत्र प्रभृति आपके कोई नहीं ; एक सराय के मुसाफिरके समान हैं । यहाँ आकर नाता जुड़ गया है । अपने-अपने टाइटम पर सब अपनी-अपनी राह लेंगे । इसके सिवा, ये आपसे सच्ची मुहब्बत भी नहीं करते । आपसे इनका काम निकलता है, पाप-पुण्यकी गठरी आप बाँधते हैं और सुख ये भोगते हैं ; इसीसे कोई आपको “बाबूजी”, कोई “चाचाजी” और कोई “नानाजी” कहता है । अगर आप इनकी ऊकुरतों या फरमायशोंको पूरी न करें, तो ये आपका नाम भी न लें । ऐसे स्वार्थी लोगोंको मिथ्या प्रीतिके फेरमें पड़कर, आप अपने अमूल्य और दुष्प्राप्य जीवनको क्यों नष्ट करते हैं ? जब आप इस देहको छोड़कर परलोकमें जायँगे, तब क्या ये आपके साथ जायँगे ? हरगिज नहीं । कोई पौली तक और कोई श्मशान तक आपकी लाशके साथ जायँगे । वहाँ पहुँच, आपको जला-बला खाक कर सब भूल जायँगे ।

आप भी मुसाफिर हैं और आपके स्त्री-पुत्र भी मुसाफिर हैं । आपकी अगली सफर बड़ी लम्बी है । यह तो बीचका एक मुकाम है । कर्म-भोग भोगनेको आप यहाँ ठहर गये और कर्मवश ही इन सबसे आपका मेल हो गया । ये अपनी सफर का प्रबन्ध करें चाहे न करें, पर आप तो अवश्य करें । इनके झूठे मोहमें आप न भूलें । अगर आप बाल-बच्चोंकी रोटी

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और कपड़ोंकी फिकमें लगे रहेंगे, तो यह फिक तो अन्त तक लगी ही रहेगी और आपको ले जानेवाली गोड़ी या मौत आ जायगी। उस समय बड़ी कठिनाई होगी। जो लोग उग्र-भर गृहस्थीके कर्मठोंमें लगे रहे, अन्तमें उनका बुरा ही हुआ। ये घर-भगड़े ही तो ईश्वर-दर्शन या स्वर्ग अथवा मोक्षकी प्राप्ति में बाधक हैं। महात्मा शैल सादीने कहा है :—

ऐ गिरफ़्तारे पाये बन्दे अयाल ।

दिगर आज्ञादगी मबन्द खयाल ॥

गुमें फ़रज़न्दो नानो जामग्रो कृत ।

बाजद थारद जे सेर दर मलकृत ॥

ऐ औलाद की मुहब्बतमें गिरफ़्तार रहनेवाले, तू किसी तरह भी बन्धन-मुक्त नहीं हो सकता। सन्तान, रोटी, कपड़ा तथा जीविका की फिक तुझे स्वर्गकी चिन्तासे रोकती है। इसलिये “सब तज और हर भज।”

क्या घरमें रह कर ईश्वर-उपासना

नहीं की जा सकती ?

घर-गृहस्थीमें रहकर ईश्वर की भक्ति और उपासना की जा सकती है; पर घरमें रह कर भक्ति करना है टेढ़ी खोर। जैसी संगति होती है, वैसा ही मनुष्य हो जाता है। ज्ञानियों

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की संगतिमें ज्ञानकी और स्त्रियोंकी सुहृदत्वमें कामकी उत्पत्ति होती है। घरमें रह कर वैराग्य की उत्पत्ति होना कठिन है। किसी कविने कहा है :—

जाइयो तहाँ ही जहाँ संग न कुसंग होय,

कायरके संग शूर भागे पर भागे है ॥

फूलन की वासना सुहाग भरे वासन पै,

कामिनीके संग काम जागे पर जागे है ॥

घर बसे घर पै बसो, घर वैराग कहाँ,

काम कोष लोभ मोह, पागे पर पागे है ।

काजरकी कोठरीमें, लाखहु सयानो जाय,

काजरकी एक रेख, लागे पर लागे है ॥

संसारियोंकी सङ्गतिमें मनुष्य संसारी हो जाता है ; विषय-भोगोंकी ओर ही उसका मन चलायमान होता है तथा स्त्री-पुत्र आदिकोंमें उसका राग बनाही रहता है ; पर जो वेदान्त-ग्रन्थोंको विचारते और महापुरुषोंकी सङ्गति करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध होते रहने की वजह से, उन्हें, गृहस्थाश्रम में ही, वैराग्य उत्पन्न होने लगता है। गृहस्थीमें एक न एक दुःख बना ही रहता है। उस दुःखके कारण, मनुष्यके मनमें वैराग्य भी पैदा होता रहता है। विषयोंमें दुःख समझना ही वैराग्यका और सुख समझना ही रागकर्म हेतु है। महामूर्दोंको भी कुछ न कुछ वैराग्य बना ही रहता है। जिस समय कोई कष्ट आता

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है, स्त्री-पुत्र आदि मर जाते हैं, धन नाश हो जाता है, तब मूढ़ भी अपने तर्क और संसारको धिक्कारता है ; लेकिन ज्योंही वह कष्ट दूर हो जाता है, उसका वैराग्य भी काफूर हो जाता है । पर, वास्तवमें, वैराग्यका कारण—है गृहस्थाश्रम ही ; क्योंकि बिना गृहस्थाश्रम तो किसी की उत्पत्ति होती ही नहीं । रामचन्द्र और वशिष्ठ प्रभृतिको गृहस्थाश्रममें ही वैराग्य हुआ था । और भी बड़े-बड़े संन्यासियोंको गृहस्थाश्रममें ही वैराग्य हुआ था । वैराग्य उत्पन्न होते ही, उन्होंने घर-गृहस्थी त्याग, वन की राह ली थी ।

यह बात भी नहीं है कि, गृहस्थाश्रममें ज्ञान होता ही न हो । जनकादिक महात्मा गृहस्थाश्रममें ही ज्ञानी हुए थे । ज्ञानका कारण “वैराग्य” है । जो गृहस्थ होकर, सदैव, वैराग्य और विचारमें मग्न रहता है, उसके ज्ञानी होनेमें सन्देह नहीं ; पर जो संन्यासी होकर भी भोगोंमें राग रखता है, उसके अज्ञानी होनेमें संशय नहीं । “वैराग्य” ही आत्मज्ञानको साधन है । मनुष्य—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यास—किसी आश्रममें क्यों न हो, बिना वैराग्यके ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना मोक्ष नहीं । जो पुरुष गृहस्थाश्रममें रह कर भी उसमें आसक्त नहीं होता, जलमें कमलकी तरह रहता है, उसको मुक्तिमें ज़रा भी सन्देह नहीं । एक दृष्टान्त इस-मौके का हमें याद आया है, उससे पाठकोंको अवश्य लाभ होगा :—

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राजा जनक और शुक्रदेव जी ।

एक बार व्यास जीने शुक्रदेव जीसे कहा कि, तुम राजा जनकके पास जाकर उपदेश लो । शुक्रदेव जी जनकके द्वार पर गये । भीतर खबर कराई, तो राजाने कहला भेजा कि, द्वार पर ठहरो । शुक्रदेव जी तीन दिन तक द्वार पर खड़े रहे, पर उन्हें क्रोध न आया । राजाने उनके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये ही, उन्हें, तीन दिन तक, द्वार पर खड़ा रक्खा और चौथे दिन अपने पास बुलाया । वहाँ जाकर शुक्रदेव जी क्या देखते हैं कि, राजा जनक सोनेके जड़ाऊ सिंहासन पर बैठे हैं, सुन्दरी नवयौवना स्त्रियाँ उनके चरण दाब रही हैं और कुछ मोरछल और पक्षु कर रही हैं । जगह-जगह विषय-भोग या ऐश-आरामके सामान घरे हैं । सामने ही सुन्दरी नर्तकियाँ नाच कर रही हैं । यह हाल देखकर, शुक्रदेव जीके मनमें राजाकी ओरसे घृणा हुई । उन्होंने मनमें कहा—“नाम बड़े और दर्शन छोटे” वाली बात है । यह तो भोगोंमें आसक्त है ; पिताजीने इन्हें परम ज्ञानी क्यों कहा ? राजा जनक शुक्रदेव जीके मनकी बात ताड़ गये । देवात ; उसी समय मिथिलापुरीमें जोरसे आग लग गई । बाहरसे दूत दौड़े आये और कहने लगे—“महाराज ! पुरीमें आग लग गई है और राजद्वार तक आ पहुँची है ।” शुक्रदेव जी मनमें सोचने लगे कि, मेरा

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दृण्ड-कमण्डल बाहर रक्खा है, कहीं वह न जल जाय । उस समय राजाने कहा—

“अनन्तवत्तु मे वित्तं यन्मे नास्ति हि किञ्चन मिथिलायां प्रदग्धायाम् न मे दद्याति किञ्चन ।”

मेरा आत्मरूप-धन अनन्त है । उसका अन्त कदापि नहीं हो सकता । इस मिथिलाके जलनेसे तो मेरा कुछ भी नहीं जल सकता ।

राजा जनकके इस वाक्यसे पदार्थोंमें उनको आसक्ति नहीं—अनासक्ति ही साबित होती है । अगर कोई मनुष्य, गृहस्थोंमें रह कर, स्त्री-पुत्र-धन प्रभृतिमें अनासक्त रहे, उनमें ममता न रक्खे, चाहे व्यवहार सब तरहके करे, वह सच्चा ज्ञानी है, उसको मोक्ष अवश्य होगी ।

ममता ही दुःखोंका कारण है । जिसकी किसी भी पदार्थ में ममता नहीं, उसे दुःख क्यों होने लगा ? उसकी ओरसे वह पदार्थ मिले तो अच्छा, न मिले तो अच्छा ; बचा रहे तो भला और नष्ट हो जाय तो भला । जिसकी जिस चीज़में ममता होती है, उसे उस चीज़के नाश होने या उसके न मिलनेसे अवश्य दुःख होता है । कहा है ।

यस्मिन् वस्तुनि ममता मम नायस्तत्र तत्रैव ।

यत्वेवाहमुदासे मुदा स्वभाव सन्तुष्टः ॥

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जिस-जिस चीज़में मनुष्यकी ममता है, वही-वही दुःखी है और जिस जिससे उसे उदासीनता है, वही सन्तुष्टता है। मत-लब यह कि, “ममता” ही दुःखोंका मूल है। घर-गृहस्थीमें रहो और गृहस्थोंके सारे कार्य-व्यवहार करो ; पर किसी भी पदार्थ में ममता मत रखो। तुम्हारी ओरसे कोई मर जाय तो शोक नहीं, धन-दौलत नष्ट हो जाय तो रंज नहीं, आ जाय तो खुशी नहीं ; इस तरह उदासीन-भाव रखो। अगर इस तरह गृहस्थी में रहो, तो तुमसे बढ़कर ज्ञानी कौन है ? तुम्हें अवश्य मोक्षपद मिलेगा।

निर्मीही पुरुष ।

—○—

एक मनुष्यके एक ही लड़का था ! लड़का जवान हो गया था । उसकी शादी भी हो गई थी । एक दिन पिताने किसी उद्देश्यसे शामको एक सभा बुलानेका निमन्त्रण दिया । देवयोगसे, दोपहरको उसका पुत्र अचानक मर गया । उसने उसकी लाशको बैठकमें लिटा कर, ऊपरसे कपड़ा उड़ा दिया और आप द्वार पर बैठकर शान्त-भावसे हुक्का पीने लगा । इतनेमें सभाका समय हो गया ; मित्र लोग आने लगे । उदमें से एक मित्र उसी बैठकमें किसी ज़रूरी कामसे गया । वहाँ एक लाश पड़ी देख, उसने बाहर आकर पूछा,— “यह क्या !”

( ४११ )

उसने कहा—“भाई ! लड़का मर गया है । पहले सभाका काम कर ले ; तब सब मिल कर इसे श्मशान-घाट पर ले चलेंगे ।” मित्र लोग उस निर्मोही पिताकी बात सुनकर चकित हो गये । उन्होंने कहा—“तुम तो अजब आदमी हो ! तुम्हें अपने इकलौते जवान पुत्रका भी रक्ष नहीं ! उसने कहा—“भाई ! मेरा इसका क्या नाता ? हम सब सरायके मुसाफिर हैं । पूर्वजन्मके कर्मवश, एक दूसरेसे मिल गये हैं । अपना-अपना समय होनेसे, अपनी-अपनी राह चले जा रहे हैं ; इसमें रक्ष या शोककी बात ही क्या है ?” ऐसे ही मनुष्य, गृहस्थीमें रहकर भी, जन्म-मरणके फन्देसे छूटकर, मोक्ष लाभ करते और जीवनमुक्त कहलाते हैं ।

काम करो, पर मनको ईश्वरमें रखो ।

— * —

अगर भगवान् कृष्णके कथनानुसार संसारके काम-धन्धे किये जाय, तोभी हर्ज नहीं ; पर मनको संसारी पदार्थों या विषय-भोगोंसे हटाकर एकमात्र भगवान्में लगाना चाहिये । दुनियाची काम करते रहने और मनको भगवान्में लगाये रहने से सिद्धि मिल सकती है । महाकवि रहीम कहते हैं :—

दोहा ।

जो “रहीम” मन हाथ है, मनसा कई किन जाहि । जलमें जो छाया परी, काया भीजत नाहि ॥

( ४१२ )

सारा द्वारमद्वार मन पर है। व्यवभिचारिणी ली धरके धन्धे किया करती है, पर मनको हर क्षण अपने थारमें रखती है। गाय जहाँ-तहाँ घास खरती-फिरती है, पर मनको अपने बन्धनेमें रखती है। स्त्रियाँ जब ध्यान कूटती हैं, तब एक हाथसे मूसल चढ़ाती हैं और दूसरेसे ओखलीके धानको ठीक करतो जाती हैं। इसी बौधमें यदि उनका बच्चा आ जाता है, तो उसे दूध भी पिलाती रहती है; किन्तु उनका ध्यान बराबर मूसलमें ही रहता है। अगर जूरा भी ध्यान टूटे, तो हाथके पल्लस्तर उड़ जायँ। इसी तरह मनुष्य, यदि संसारके काम-धन्धे करता हुआ भी, ईश्वरमें मन लगाकर उसकी भक्ति करता रहे, तो कोई हर्ज नहीं; उसे भगवत्-दर्शन अवश्य होगा। यद्यपि इस तरह संसारमें रहकर सिद्धि लाभ करना—है बड़े शूरवीरोंका काम; तोभी इस तरह अनेक लोग, गृहस्थोंमें रहते हुए भी, मोक्ष-पद पा गये हैं।

ईश्वर-प्राप्तिकी सहज राह कौनसी है ?

गृहस्थीमें रहने की अपेक्षा, गृहस्थी त्यागकर, वनके एकान्त भागमें रहकर, भगवत्में मन लगाना अवश्य आसान है।* गृहस्थीमें रहनेसे मन विषय-भोगोंकी ओर दौड़ता ही है। खीको देखनेसे काम जागता ही है; पर न देखनेसे मन नहीं चलता। पराशर ऋषिने मतस्यगन्धा देखी, तो उनका मन चलायमान हुआ। विश्वामित्रने मेनका देखी तो उनका मन

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बिगड़ा। शिवने मोहिनी देखी, तो उनका मन चञ्चल हुआ। इसीलिये पहलेके अनेक महापुरुष अपने-अपने घर त्यागकर बनमें चले गये और वहाँ उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई। पर बनमें जाकर भी, जो मनको विषयों में लगाने रहते हैं, ममताको नहीं त्यागते; कामनाको नहीं छोड़ते, वे गृहस्थोंसे भी बुरे हैं। वे धोबीके कुत्तेकी तरह घरके न बाटके।

त्यागमें ही सुख है।

—○—

जो धन-दौलत, राजपाट, स्त्री-पुत्र प्रभृतिको त्याग कर बनमें रहते हैं; किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यहाँ तक कि, खानेके लिये पाव-भर आटेकी भी जरूरत नहीं रखते; जहाँ जगह पाते हैं वहाँ पड़ रहते हैं; जो मिल जाता है, उसीसे पेट भर लेते हैं,—वे सच्चमुच ही सुखी हैं। शङ्कराचार्य्य महाराजने “मोहमुद्गर” में कहा है—

सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः,

शय्याभूतलभजिनंवासः।

सर्वपरिग्रहभोगत्यागः,

कथ्य सुखं न करोति विरागः ॥

जो देवमन्दिर या पेड़के नीचे पड़े रहते हैं, ज़मीन ही जिनकी चारपाई है, मुगड़ाला ही जिनका वस्त्र है, सारे विषय-

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भोगके सामान जिन्होंने त्याग दिये हैं ; यानी वासना-रहित हो गये हैं,—ऐसे किन मनुष्योंको सुख नहीं है? अर्थात् ऐसे त्यागी सदा सुखी हैं।

देहके नहीं मनके वैराग्यसे लाभ है।

— * —

अनेक लोग गेहूँ कपड़े पहन लेते हैं, लम्बी-लम्बी मालाये गलेमें डाल लेते हैं, लिलक-छापे या राख लगा लेते हैं ; पर उनका मन सदा भोगोंमें लगा रहता है। वे शरीरको वैरागियोंका सा बना लेते हैं ; पर मन उनका भोगियोंका सा रहता है ; इसलिये उनका जन्म नृश जाता है। आजकल साधू-संन्यासी बनना एक प्रकारका रोज्गार हो गया है। जिनसे किसी तरहकी मिहन्त-मत्तदूरी नहीं होती, वे साधु-वेध बनाकर लोगोंको ठगते और घर मनी-बाडर भेजते हैं। बहुतसे लोगों नगरोंमें आकर बड़े आदमियोंके यहाँ डरे लगा देते हैं, चेड़े-बैठियोंसे भेंट लेते हैं, नवयौवना सुन्दरियोंको पास बैठाकर उपदेश देते हैं, अपने क्रदमोंमें रुपये और अशक्तियोंके हेर लगवाते हैं। भला ऐलोंका मन परमात्मामें लग सकता है? जब विश्वाभिन्न और पराशर जैसे, हवा और पानी पर गुज़ारा करनेवाले, मुनियोंका मन स्त्रियोंको देखते ही चञ्चल हो गया ; तब रबड़ी-मलाई और मावा-मोहनभोग उड़ाने

( ४१५ )

बालोंका मन कैसे स्वियोंपर न चलेगा ? ऐसा कौन है, जिसका मन स्वियोंने खण्डित नहीं किया ? कहा है—

कोऽर्थान् प्राप्य न गर्विता ?

विषमिषः कस्यापदो नागता : ?

क्षीमिः कस्य न खण्डितं सुवि मनः ?

को नाम राज्ञां प्रियः ?

कः कालस्य न गोबरान्तरगतः ?

कोऽर्थी गतो गौरव ?

को वा दुर्जन-वागुग्रा-निपतितः

क्षेमेण यातः पुमान् ?

किसको धन पाकर गर्व नहीं हुआ ? किस विषयी पर आफ़्त नहीं आई ? पृथ्वी पर किसका मन नारीने आकृष्ट नहीं किया ? कौन राजाओंका प्यारा हुआ ? कौन कालकी नजरसे बचा ? किस मँगतेका गौरव हुआ ? कौन सज्जन दुष्टोंके जालमें फँसकर कुशलसे रहा ?

संन्यासियोंको स्त्री-दर्शन भी मना है ।

धर्मशास्त्रमें लिखा है :—

सम्भाषयेत् क्षिप्रं तैव, पूर्वदृष्टं च न स्मरेत् । कथां च वजयेत्तासां, नो पर्येक्षिष्वितामपि ॥

( ४१६ )

यस्तु प्रवजितो भूत्वा पुनः सेवेतु मैथुनम् ।

षष्ठिवर्षसहस्राणि विष्णुयां जायते क्रुमिः ॥

यतिको स्त्रीसे बात न करनी चाहिये, पहलेकी देखी हुई स्त्रीकी याद न करना चाहिये तथा स्त्रियोंकी चर्चा भी न करनी चाहिये और स्त्रीका चित्र भी न देखना चाहिये ।

जो संन्यासी होकर स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ६० हजार वर्ष तक विष्णुका कीड़ा होता है ।

और विषयोंसे मनको रोकना उतना कठिन नहीं, जितना कि स्त्रीसे रोकना कठिन है ; इसीसे स्त्रीका चित्र तक देखनेकी मनाही की है । जो ढोंगी साधु-सन्यासी दुनियादारोंके घर आते और स्त्रियोंमें बैठे रहते हैं, उनको उपदेश ग्रहण करना चाहिये ।

ढोंगी साधुओंके लिये अमूल्य उपदेश ।

✠ ● ● ● ✠

बनावटी या ढोंगी साधुओंके सम्बन्धमें महात्मा तुलसी- दासजीने कहा है :—

तनको योगी सब करें, मनको विरला कोय ।

सहजे सब सिधि पाइये, जो मन योगी होय ॥१॥

जाके उर बर वासन्य, भई भास कछु आन ।

तुलसी ताहि बिड-बना, केहि बिधि कथहि प्रमान ॥२॥

( ४१७ )

काह भयो बन बन फिरे, जो बनि आगो नाहिं । बनते बनते बनि गयो, तुलसी घर ही माहिं ॥३॥ रामचरण परचे नहीं, बिन साधन पद-नेह । मुँड़ मुड़ायो बादिही, भाँड़ भये तजि गेह ॥४॥ कीर सरस वाणी पढ़त, चाखत चाहन खोंड़ । मन राखत वैराग महँ, घरमें राखत राँड़ ॥५॥ जहाँ काम तहँ राम नहीं, जहाँ राम नहीं काम । तुलसी दोनों नहीं मिलें, रवि रजनी इक ठाम ॥६॥ तब लगि योगी जगत्-गुरु, जब लगि रहै निरास । जब आशा मनमें जगी, जग गुरु योगी दास ॥७॥

( १ )

शरीरको योगी बहुत लोग करते हैं ; पर मनको कोई विरला ही योगी करता है ; अगर मन योगी हो जाता है ; तो सहजमें सिद्धि या मोक्ष मिल जाती है । दूसरे शब्दोंमें यों समझिये कि, लोग शेष तो संन्यासी-महात्माओंकासा कर लेते हैं ; पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है ; इसलिये उनको कुछ भी लाभ नहीं होता,—सिद्धि नहीं मिलती । अगर वे लोग शरीरको चाहे गृहस्थोंकासा रखें, उत्तमसे उत्तम खाने खाद्य, बढ़ियासे बढ़िया कपड़े पहने ; पर मनमें स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, नाच-रङ्ग आदिकी वासना और ममता न रखें ; तो उन्हें निश्चय ही सिद्धि मिल

२७

( ४१८ )

सकती है। मतलब यह कि, मनके योगी होनेसे सिद्धि मिलती है; कपड़े रँगने, माथा मुँडाने और डण्ड-कमण्डल प्रभृति रखनेसे सिद्धि नहीं मिलती।

( २ )

जिसके विशुद्ध हरि-भक्तिपूर्ण हृदयमें काम, लोभ और मोह प्रभृतिकी वासना पैदा हो जाती है, वह अपनी वासना पूरी करनेके लिये, नाना प्रकारके नोच कर्म करता है; फिर उसकी जो कृतीती और बदनामी होती है, उसका यथार्थ रूपमें वर्णन करना कठिन है। मतलब यह है कि, जिसके हृदय में केवल एक भगवान्को वासना होती है, उसका हृदय श्रेष्ठ और विशुद्ध समझा जाता है। यदि उसके हृदयमें इसके सिवा—भगवान्के अतिरिक्त और वासना उत्पन्न हो उठती है, उसका दिल धन-दौलत, स्त्री और राजपाट प्रभृतिपर चलायमान हो जाता है; तो उसकी संसारमें बड़ी बदनामी होती है। सारांश यह कि, यदि कोई संन्यासी, यति या हरिभक्त विषयोंको त्याग कर फिर विषयोंके जालमें फँसता है, राँड रखता है, इत्र फुलेल लगाता है, मलमल-खासा पहनता है और गद्दे तकियोंपर आराम करता है; तो उसकी वर्णनातीत अपकीर्ति होती है।

( ३ )

अगर कोई शस्त्र घर छोड़ कर और संन्यासी का भेष बना कर बन-बन फिरता है; पर उसका मन भगवान्में नहीं लगता, तो उसके घर छोड़ने और तकलीफ उठानेसे कोई लाभ नहीं।