भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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भजन ( राग काफी ) ।

नर समझत नाहिं अनारी ॥ टेर ॥ गर्भवसमें उलटो लटक्यो, पायो दुःख अति भारी । जोगसु ! अबके मैं बाहर निकसों, तेरो भजन कहूँ हरबारी ।

पलक नाहिं देउँ बिसारी ॥ १ ॥ जन्म होत माया लिपटायो, भूल गया सुध सारी । भक्ति भावमें चित ना राख्यो, ऐसी कुमत्त बिचारी ।

जन्मकी कर दई ख्वारी ॥ २ ॥ आया था कुछ लाभ करनेको, गँठकी पूँजी हारी । सौदा कर ले राम नामका, आओ शरण गिरधारी ।

भरोसा जिनका है भारी ॥ ३ ॥ श्री सतगुरु तोहि नित समझावें, वे हैं सबके हितकारी । आप तैं औरनको ताँरें, कहै “हरिदास” पुकारी । उम्र योही सुफ्त गुज़ारी ॥४॥

गुज़ल ।

उठ जागरे मुसाफ़िर ! किस नींद सो रहा है ? । जीवन अमूल्य प्यारे, क्यों सुफ्त खो रहा है ? ॥१॥ रहना न यहाँ पे हेगा, दुनियाँ सराय फ़ानी । किसकर नदीमें प्यारे, क्यों मस्त हो रहा है ? ॥२॥

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