भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३७६ )

ले ले धरमका तोषा, मत भूल ऐ दिवाने ! । नेकी की खेती करले, क्यों पाप बो' रहा है ? ॥३॥ माता पिता वा भाई, होंगे न केई साथी । क्यों मोहरूपी बोम्मा, नाहक केा टो रहा है ? ॥४॥ किरती तेरी पुरानी, हिकमतसे पार करले । ऐ दिल ! अथाह जलमें, तू क्यों डुबो रहा है ? ॥५॥

भजन ( लावनी )

पड़ लोभ मोहके जालमें, नर आयू क्यों खोता है ॥ टेक ॥ यह जग जान रैनका सुपना, जिसकेा कहता अपना-अपना । भूल गया ईश्वरका जपना, फँसा हुआ धन-मालमें । क्या सुखकी नींद सोता है ? ॥ १ ॥

चले अकड़ बन छैल छबीला, अन्त समय सब हा जाय टीला । काम न आये कुटुम्ब-कबीला, भूला जिनके ख्यालमें ।

केई साथी नहीं होता है ॥ २ ॥

अब क्यों सिर धुनि-धुनि पछितावे, रदन करै और रौल मचावे । कुछ नहीं तेरी पार बसावे, चूका पहिली चालमें ।

क्या खड़ा-खड़ा रोता है ? ॥ ३ ॥

समझ सोच कर कदम उठाना, मुश्किल मनुषजनम है पाना । कहै "सुरारी" जो हो दाना, भ्रज हर को हर हाल में ।

क्यों पाप-बीज बोता है ? ॥ ४ ॥