वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ३४८ )
हो जायगा, तो उसके बाद हम सब गृहस्थीके भगड़े छोड़ भगवत् भजन करेंगे, वे इस तरहके विचार किया ही करते हैं कि, इतने में उनका समय पूरा हो जाता है और काल उनका चोटा पकड़ कर उन्हें लेजाता है। उस वक्त वह बहुत पछताते और सिर धुनते हैं, लेकिन उस समय हो क्या सकता है ? उस समय उनकी गति उस भौरैकी सी होती है, जो कमलके मुखमें बन्द होकर कहता है :—
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ।
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजालम् ॥
इत्थं विचिन्तयति कोशागते द्विषेपे ।
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार ॥
बड़े-बड़े शालके लहड़ोंको छेद डालनेकी शक्ति रखनेवाला भौरा, प्रेमके सारे, कोमल कमलमें बन्द हो जाता है। रात हो जाती है और भौरा कमलके भीतर बैठा हुआ विचार करता है :—“अब रातका अवसान होगा, सवेरा होगा, सूरज उदय होगा और यह कमल खिल जायगा ; तब मैं निकल जाऊँगा। अब रात-भर यहीं आनन्द करूँ।” वह तो ऐसे विचार करता ही रहता है, कि जड़ूली हाथी कमलको उखाड़कर मुँहमें रख लेता है और भौरैके मन-की-मनमें ही रह जाती है। यही वंशा संसारी विषय-लोलुपों की है ! वह विचार बांधा ही करते हैं और काल उन्हें मुँहमें धर लेता है। अतः हो सके
वैराग्यशतक ~~~~~
इती (२) ॥
एक
ता, न के
भौरा कमल में बँटा हुआ अनेक तरह के विचार करता है, हतने में हाथी आकर भौरा समेत कमल को खाजाता है। यही दशा हमारी है। हम रात-दिन विषय-भोगों में लगे रहते हैं और मृत्यु अचानक आकर हमें लील जाती है।
(पृष्ठ ३६६)
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( ३४६ )
तो, बचपनमें ही ईश्वर-भजन करो। बचपनमें यदि ऐसा सौभाग्य न हो, तो जवानीमें तो न रूको। जवानी इसके लिये अच्छा समय हैं। उस अवस्थामें शक्ति रहती है। जवानीमें ईश्वर-भक्ति करनेवाला निश्चय ही मोक्ष या स्वर्ग पाता है। कहा है :—
दानं दरिद्रस्य प्रभोश्च शान्तिः
यूनां तपो ज्ञानवताच्च मौनम् ।
इच्छा निवृत्तिश्च सुखासितानां
दया च भूतेषु दिवं नयन्ति ॥
दरिद्रताका किया दान, निग्रह अनुग्रहकी शक्ति होनेपर क्षमा, जवानीका किया तप, विद्वान् होकर चुप रहना, सुख-भोगकी सामर्थ्य होनेपर इच्छाओंको रोक लेना और प्राणियों पर दया करना—ये स्वर्गकी प्राप्ति कराते हैं।
ईश्वर-भजनमें आज-कल मृत करो।
एक धनवान सदा घर-धन्योमें लीन रहता था। उसकी स्त्री उससे बहुत-कुछ कहती कि, हे स्वामी ! यह शरीर विषय-भोगोंके लिये नहीं, बल्कि परमात्माकी भक्तिके लिये मिला है। इसे पारस-मणि समझकर, इससे मोक्ष-रूपी सोना बना
इती (२)
॥
एक
ता, व के रन्नु सत, रन्नु रना
ीकि सके
( ३५० )
लौजिये । ऐसा न हो कि, आप सोना न बनावें और यह पारख-मणि पहले ही आपसे छीन ली जाय । इस शरीरका बारम्बार मिलना कठिन है। ८४ लाख योनियों भोगनेके बाद यह मनुष्य-चोला मिला है। इस बार यदि इससे काम न लिया जायगा, तो फिर चौरासों लाख योनियोंमें जन्म-मरण होनेपर यह मनुष्य-चोला मिलेगा ; इसलिये दो बार घड़ी तो सब तरफसे मनको हटाकर परमात्माकी याद किया करो । लौ उससे बार बार कहती, पर वह सेठ उसकी बात टाल देता ।
एक दिन सेठ बीमार हो गया । उसने सेठानीसे वैद्यके बुलानेको कहा । सेठानीने वैद्यको बुलाया । वैद्यने नाड़ी नज्ज देख, रोगका हाल पूछ, दवाका नुसखा लिख दिया और सेवन-विधि बताकर चला गया । सेठानीने पंसारीके यहाँ से दवा मँगा, आठेमें रख दी । दिन-भर हो गया, पर सेठको दवा न दी । सन्ध्या-समय सेठने कहा—“क्या दवा नहीं मँगाई गई ?” सेठानीने कहा—“जी, दवा तो मँगाली है, पर वह रखी है उस ताकमें ।” सेठने पूछा—“अबतक दी क्यों नहीं ?” सेठानीने कहा—“जल्दी क्या है ? आज नहीं तो कल, नहीं तो परसों दे दूँगी । कभी न कभी देही दूँगी ।” सेठने कहा—“अगर मैं मर गया, तो दवा फिर कौन काम आवेगी ?” सेठानीने कहा—“मरनेको तो आप मानते ही नहीं । मैं जब-जब भगवत्-भजन करनेको कहती हूँ, तब-तब आप कह देते हैं कि, देखा
( ३५१ )
जायगा ; जल्दी थोड़े ही हैं । यदि आपको मरनेकी ही याद होती, तो ऐसा न कहते । आज दवाके लिये आपको मरनेकी याद आई है । जिस तरह दवाकी योगनाशके लिये ज़रूरत है ; उसी तरह भजनपूजनकी जन्म-मरणका फन्दा काटनेके लिये ज़रूरत है । ऐसा न हो कि, पशु-यौनि मिल जाय और सारा गुड़ गोबर हो जाय ।” आज स्त्रीका उपदेश लग गया । खेटको वराग्य हो गया । खेतानौने उसे दवा पिला दी और वह अच्छा भी हो गया । उसी दिनेसे उसने ईश्वर-भजनमें लौ लगादी । वह और सब भूला, पर ज़िन्दगी भर मौत और ईश्वरको न भूला ।
मौतको हरदम याद रखो ।
एक बाढ़शाहने अपने दरबार और बैठनेके स्थानोंमें कुम्बे बनवा-रक्खी थीं । वह चाहता था कि, मैं हरदम कुम्बों को देखकर मौत को न भूलूँ । मौतकी याद रहनेसे पापोंसे बचा रहूँगा और ईश्वरको न भूलूँगा । हमारे यहाँके अनेक सच्चे सिद्ध अकसर श्मशान भूमिमें ही अपना डेरा रखते हैं । सारांश यह, मनुष्यको अपनी मौतकी याद सदा रखनी चाहिये, ताकि संसारसे वैराग्य होकर ज्ञान हो और ज्ञानसे मोक्ष मिले । महात्मा कबीरने पूर्व ज़बर्दस्त चेतावनी दी है :—
( ३५२ )
“कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नौही काल ।
चेत सके तो चेतियो, मीच परी है ख्याल ॥
हे कबीर ! जो दिन आज है, वह कल नहीं होगा ; यानी आजका सा मौका फिर कल न मिलेगा। चेतना है तो चेत जा ! देख, मृत्यु तेरी धातमें है। वृहस्पति बिछीकी तरह ऋषड़ा मारना ही चाहती है।
गोस्वामीजीने भी खूब कहा है :—
“तुलसी” बिलंब न कीजिये, भज लीजै रघुवीर ।
तन तरकसते जात है, श्वास सार सो तीर ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पलमें परलय होयगी, बहुरि करोगे कव ?
तुलसीदासजी कहते हैं, देर न करो, भगवान्को भज लो ; क्योंकि तन-रूपी तरकससे श्वास-रूपी तीर, जो सार है, निकला जाता है। जो काम कल करना है, उसे आज ही कर डालो और जो आज करना है, उसे अभी कर डालो ; क्योंकि यदि पलमें प्रलय हो गई, तो फिर कब करोगे ?
जो मनुष्य दिन-रात घर अंधोंमें ही लगे रहते हैं, कभी खुश होते हैं, कभी रंज करते हैं, कभी कन्याके वैधन्य-दुःखको देखकर जलते रहते हैं, तो कभी पुत्रके मरणसे आँधा मुँह किये पड़े रहते हैं अथवा कान्ता-विभ्रमो या स्त्रीके मरणसे तड़फते हैं, अथवा धनवृद्धिके लिये दौड़ते फिरते हैं। लेकिन परमात्माका
( ३५३ )
नाम कभी नहीं लेते ; यदि लेते हैं तो हाथ को तो गोमुखीमें रखते ह, पर मनको विषयोंमें लगाने रहते हैं, लोगोंसे बातें करते रहते और सड़ासड़ माला फेरा करते हैं, ऐसोंके पास एक दिन भी चतुर पुरुषोंको न रहना चाहिये । कहा है :—
राजा धर्मविना, द्विजः शुचिविना, ज्ञानं विना योगिनः ।
कान्ता सत्यविना, ह्यो गति विना, भूषा च ज्योतिर्विना ॥
योद्धा शूरविना, तपो व्रत विना, छन्दो विना गीयते ।
भ्राता स्नेह विना, नरो हरि विना, मुञ्चन्ति शीघ्रं बुधाः ॥
धर्महीन राजाको, शौचहीन ब्राह्मणको, ज्ञानहीन योगीको, असत्यवादिनी स्त्री को, गतिहीन घोड़ेको, चमक-दमक रहित गहनेको, शूरताहीन योद्धाको, नियम रहित तप को, छन्द विना कविताको, स्नेह-हीन भाईको और हरिभक्ति रहित पुरुषको बुद्धिमान लोग शीघ्र ही छोड़ देते हैं ।
हरिभक्ति रहित पुरुषको चतुर लोग इसलिये त्याग देते हैं, कि उसकी संगतिमें उनका मन भी कहीं वैसा हो न हो जाय । मनुष्य जैसी सङ्कृति करता है, वैसा ही हो जाता है । जो विषयी पुरुषोंकी सङ्कृति करता है, वह विषयी हो जाता है ; पर जो ज्ञानी और वैरागियोंकी सङ्कृति करता है, वह ज्ञानी और वैरागी हो जाता है । महापुरुषोंकी एक शुभ दृष्टिसे मनुष्य निहाल हो जाता है ; यानी भूत-बन्धनसे उसका पीडा छूट जाता है । हम आगे दोनों तरहके दृष्टान्त देते हैं :—
२३
( ३५४ )
एक राजा और महात्मा ।
किसी जङ्गलमें एक महात्मा रहते थे। वह पेड़-पत्ते और हवा खाकर ज़िन्दगी बसर करते थे। उनकी शोहरत सारे देश में फैल गई। उस देशके राजाने भी उनसे मिलना चाहा। वज़ीरने यह खबर महात्माको दी। महात्मा उस जङ्गलको छोड़ भागनेको तैयार हुए; लेकिन मन्त्रीके बहुत समझाने-बुझानेसे वह वहाँ रह गये और राजाको दर्शन देने पर भी राजी हो गये।
एक दिन राजा अपने परिवार और दरबारियोंसमेत महात्मा के दर्शनको गया। महात्माके दर्शन कर वह बहुत ही खुश हुआ और उनसे नगरमें चलकर बागमें तप करनेकी प्रार्थना की। महात्मा बहुत जोर देनेसे इस बात पर राजी हो गया। राजाने अपने बागमें उसके लिये एक एकांत कमरा खूब सजवा दिया। मखमली गद्दे, तकिये, कौच, पलंग और कुरसियाँ रखवा दीं और चौदह-चौदह बरस की सुन्दरी मनमोहिनी कामिनियाँ महात्माजीकी सेवाको नियुक्त कर दीं।
महात्माजी खूब आनन्दसे दिन गुज़ारने और विधुबदनी कामिनियोंको भोगने लगे। चन्द्ररोज़में ही वह विषयोंके वशीभूत हो गये। एक दिन राजा फिर उनसे मिलने गया। उसने देखा कि, महात्माजीका रंग रूप गुलाबके फूल-जैसा
( ३५५ )
हो गया है। वह मसनदके सहारे लेटे हुए हैं और चन्द्रानना खियाँ उन पर मोरछल कर रही हैं। यह तमाशा देख राजा को बड़ा दुःख हुआ। उसने अपने मन्त्रीसे यह हाल कहा। मन्त्रीने कहा,—“महाराज ! निवृत्ति मार्ग वालोंको प्रवृत्ति मार्ग वालोंकी सङ्कृति भूलकर भी न करनी चाहिये। कहा है :—
“कामिनां कामिनीनां च संगत् कामी भवेत् पुमान् ।
देहान्तरे ततः क्रोधी लोभी मोही च जायते ॥
“काम क्रोधादि सांसर्गाद् शुद्ध जायते मनः ।
अशुद्धे मनसि ब्रह्मज्ञानं तच्च विनश्यति ॥”
कामी पुरुषों और खियोंकी सङ्कृतिसे पुरुष कामी और जन्मान्तरमें क्रोधी और मोही हो जाता है।
काम क्रोध आदिके सम्बन्धसे मन भी अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध मनसे उपदेश किया हुआ ब्रह्मज्ञान भी नष्ट हो जाता है।
—————— एक महात्मा और वेश्या।
एक महात्मा एक दिन वर्षामें भीगते हुए और कीचमें लिहूसे हुए एक मकानके छज्जेके नीचे जा खड़े हुए। वह मकान राजाकी वेश्याका था। महात्मा सदाँके मारे थर-
( ३५६ )
थर, थर-थर काँप रहे थे। वेश्याकी दासीने महात्माको देखा और अपनी स्वामिनीसे सारा हाल जा कहा। वेश्याने कहा—“जाओ, महात्माको लिवा लाओ।” दासी उन्हें ले आई। वेश्याने उनको स्नान कराकर नये कपड़े पहनाये और भोजन कराया। इसके बाद आप भोजन करके उनके पास गई और उन्हें पलंग पर लिटा कर उनके पैर दाबने लगी। महात्माने एक नज़र भरके वेश्याकी तरफ देखा और उसके हृदयमें अमृत की धारा बहा दी। वह सो गये और वेश्या रात-भर उनके बरण चापती रही। सबेरेंके बक्त वह सो गई और महात्मा उठकर बल दिये। भोरमें उठते ही वेश्याने दासीसे पूछा कि, महात्मा कहाँ गये? उसने कहा, कि वे तो चले गये। वेश्या उसी समय नड़ी होकर घरसे निकल गई और एक वृक्षके नीचे जाकर बैठ गई। राजाने यह समाचार सुनते ही अपने आदमी उसको लिवा लानेको भेजे। वेश्याने कहा—“राजासे कह दो, कि अब मैं आपका वह मैला उठानेवाड़ी पहलेकी भंगन नहीं हूँ।” राजाने यह बात सुन हुकम दे दिया कि, उसे कोई न छेड़े। अगले दिन वह कहीं चली गई। सब है, महापुरुषोंकी क्षणभरकी संगतिसे महापापी भी निहाल हो जाता है। निस्सन्देह सत्संग बड़ी बीज है। कहा है:—
महातुभावनसंगैः कस्य नोबतिकारकः ।
पद्मपत्रस्थितं वारिधरे मुक्ताफलश्रियम् ॥
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महापुरुषोंको संगतितसे किसकी उन्नति नहीं होती ? कमलके पत्तेपर पड़ी जलकी बूँद मोतीकी शोभाको धारण करती है ।
और भी :—
॥ दोहा ॥
जेहि जैसी संगति करी, सो तैसो फल लीन ।
कदली सीप भुजंग-मुख, एक बूँद गुण तीन ॥
जो जैसी संगति करता है, वह वैसा ही फल पाता है । मेहकी एक बूँद केलेमें कपूर, सीपमें मोती और सर्प-मुखमें विष हो जाती है ।
सवैया ।
ज्ञान बढ़ै गुनवान की संगत,
ध्यान बढ़ै तपसी-संग कीने ।
मोह बढ़ै परिवार की संगत,
लोभ बढ़ै धन में चित दीने ॥
क्रोध बढ़ै नर मूढ की संगत,
काम बढ़ै तिथ के संग कीने ।
बुद्धि विवेक विचार बढ़ै,
कवि “दीन” सुसज्जन संगत कीने ॥
सत्संगकी महिमाका पार नहीं । सत्संगसे ही दृश्य भील
( ३५८ )
बाल्मीकि ऋषि हो गये । पद्मयोगिनेसे पैदा हुए ब्रह्मा, कैवर्त्ति से पैदा हुए व्यासजी, उर्वशीसे पैदा हुए वशिष्ठजी और हिरणी से पैदा हुए ऋषि भृङ्गी सत्संगसे ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए ; अतः महापुरुषोंका संग करना चाहिये । “सत्संग” भवसागरसे पार करनेके लिये नौका-स्वरूप है । कहा है :—
तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते,
परिहर चिन्तां नश्वरचित्ते ।
क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका
भवति भवार्थोवतरणे नौका ॥
इमेशा तत्त्वकी चिन्तना कर, चञ्चल धनकी चिन्ता छोड़ । यह जगत् अल्पकालीन है ; केवल सज्जनोंकी संगति ही भव-सागरके पार जानेके लिये नावके समान है ।
इस संसार-वृक्षके जितने फल हैं, सभी प्राणीके नाश करने वाले और उसे सदा दुःखोंके गर्तमें पटक रखनेवाले हैं ; केवल दो फल अमृत-समान हैं ; कहा है :—
संसार-विष-वृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमं ।
‘काव्यामृत रसास्वादं ब्राह्मणः सज्जनैः सह ॥
इस संसार-रूपी विष-वृक्षके दो फल अमृतके समान हैं :—
(१) काव्यरूपी अमृतका रसास्वादन करना, (२) साधु पुरुषों की सद्गति करना ।
( ३५६ )
शंकराचार्यजीने कैसा अच्छा उपदेश दिया है ! इसमें संसार-सागरसे पार होनेका सारा मसाला है :—
संगः सत्सु विधीयतां, भगवतोभक्तिर्दृढा धीयतां, शान्त्यादिः परिचीयतां, दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम् । सद्भिद्यो ह्युपसर्ज्यतां, प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां, वक्षैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यम् समाकश्यताम् ॥
साधु पुरुषोंका संग करना चाहिए । भगवानमें दृढ़ भक्ति करनी चाहिये । क्षमा और दम प्रभृतिका अभ्यास करना चाहिये । संसार-बन्धनके कारण “कर्म—सकाम कर्मोंको” शीघ्र त्यागना चाहिये । सच्चे विद्वानोंकी सेवा करनी चाहिये और उनकी पादुकाएँ उठानी चाहिये । ब्रह्म-बोधक एकाक्षर प्रणव “ॐ” का जाप करना चाहिए और वेदके शिरोवाक्य “वेदान्त” को सुनना चाहिये ।
वाह ! क्या लूब कहा है ! जो इस वचन पर अमल करेगा, उसे परमानन्दकी प्राप्ति क्यों न होगी ? अवश्य होगी ।
व्यप्यय ।
योगी जग विसराय, जाय गिरिगुहा वसत है ॥ करत ज्योतिको ध्यान, मगन आसू वरषत है ॥ खगकुल बैठत अंक, स्पियत निःशंक नयनजल । धनि धनि है वे धीर, धर्यो जिन यह समाधिबल ॥
( ३६० )
हम सेवत बारी बाग सर, सरिता बापी रूपतट । खोवत हैं योंहीं आयुको, भये निपटही नीरघट ॥१०३॥
103. Worthy of all praise are those who live in the caves of mountains and contemplate upon the Supreme Light and whose tears of joy are drunk by birds sitting fearlessly in their laps, while our lives are passing fruitlessly away in pursuing frolicksome avocations in the play-gardens, situated on the banks of the tank, belonging to the spacious mansion of Desire.
- आत्रांत मरणेन जन्म जरया विद्युच्चल यौवन संतोषो धनलिप्सया शमसुखं प्रौढांगनाविभ्रमैः ॥ लोकैर्मत्सरिभिर्गुणा वनसुखो व्यालैर्नृपा दुर्जनै- रस्यैर्येण विभृतिरप्यपहता प्रस्तं न किं केन वा ॥१०४॥
मृत्युने जन्मको प्रस रक्खा है, बुढ़ापेने बिजलीके समान चन्द्र-चल युवावस्थाको प्रस रक्खा है, धनकी इच्छाने सन्तोषको प्रस रक्खा है, स्त्रियोंके हावभावोंने मानसिक शान्तिको प्रस रक्खा है, जलनेवालोंने गुणोंको प्रस रक्खा है, सर्प और जंगली जानवरोंने वनको प्रस रक्खा है, दुष्टोंने राजाओंको प्रस रक्खा है, अस्थिरता या चन्द्र-चलताने धनैश्वर्य्यको प्रस रक्खा है ; तब ऐसी कौनसी अरुच्छी चीज है, जो किसी दूसरी नाशक चीजके चंगुलमें नहीं है ? ॥१०४॥
❖ आ-समन्तांत प्रातं-प्रस्तं ।
( ३६१ )
खुलासा यह है, कि जन्मको मृत्युका भय है, जवानीको खुड़ापेका भय है, सन्तोषको लोभका भय है, शान्तिको ख़ियोकें हावभाव और विलासोंका भय है, गुणोंको उनसे जलने या कुड़नेवालोंका भय है, वनमें सर्प और हिंसक पशुओंका भय है, राजाओंमें दुष्ट दरबारियोंका भय है, धन और ऐश्वर्यमें क्षणभंगुरताका भय है। संसारमें ऐसी कोई अच्छी वस्तु नहीं है, जिसे किसीका भय न हो। मतलब यह है कि, संसार और संसारके सभी पदार्थ नाशमान हैं। ऐसी कोई वीज नहीं है, जिसका काल नाश नहीं कर देता, अथवा जिसे किसी तरहका भय नहीं है।
संसारकी यह दशा है, तब भी तो मनुष्य चेत नहीं करता, यही तो आश्चर्य की बात है ! अज्ञानी मनुष्य, मोहवश, अपना हानि-लाभ नहीं देखता ; संसारकी कूटी मायामें फँसा रहता है। तुलसीदासजीने ठीक ही कहा है :—
करत चातुरी मोहवश, लसत न निज हित हान ।
शूक मर्कट इव गहत हठ, तुलसी परम सुजान ॥
दुखिया सकल प्रकार शठ, समुक्ति परत तोड़ नाहिं ।
लसत न कण्टक पीन जिमि, ब्रशन भसत भ्रम नाहिं ॥
विषयोंके संसर्गसे मनुष्यके मनमें कामना—इच्छा पैदा होती है। जब इच्छा पूरी नहीं होती, तब क्रोध होता है और
( ३६२ )
कोधसे मोहकी उत्पत्ति होती है। मोह होनेसे प्राणीको अपना हित या परलोककी हानि नहीं दिखती। राग द्वेष प्रभृतिके कारण उसमें ज्ञानदृष्टि नहीं रहती ; पर पढ़ने-लिखनेके कारण वह अपने तर्ह परम चतुर समझता है और जिस तरह हठ करके तोता बहेलियेके फन्देमें आप ही फँस जाता है और पीजरेमें कैद हो जाता है, तथा बन्दर छोटे मुँहकी डिलियामें रोटीके लिये हाथ डालकर बन्दरवालेके कून्जमें हो जाता है ; उसी तरह विषयी पुरुष, विषयोंके ठालचमें आकर, अपने तर्ह संसार-बन्धनमें फँसा लेता है।
मनुष्य भूख, प्यास, रोग, शोक, दृदिता, प्रिय-विद्योग, बुढ़ापा, जन्म-मरण, चौरासी लाख योनियोंमें दुःख-भोग तथा नरक प्रभृतिसे हर तरह दुखी है, उसे जरा भी सुख नहीं है, पर वह मोहके मारे ऐसा अन्धा हो रहा कि, उसे कौटिमें लगे चारोंके लिये फसने वाली मछलीकी तरह कुछ भी नहीं सूझता। जिस तरह मछलीको रोटीका टुकड़ा प्यारा है ; उसी तरह मनुष्य को विषय-भोग प्यारा है। जिस तरह मछलीको काँटा है, उसी तरह मनुष्यको ममता काँटा है। मतलब यह है, अज्ञानी मनुष्य विषय-रूपी चारोंके लोभसे ममताके कौटिमें फँसकर अपना नाश करता है ; पर मज्ञा यह कि वह दुःखको दुःख नहीं समझता ; तरह-तरहके भयोंसे घिरा हुआ नाना प्रकारके संकट झेलता है ; मछली, तोते और बन्दरकी तरह बन्धनमें फँसता है, पर निकलना नहीं चाहता। इन दुःखोंका उसे
( ३६३ )
बुरा भी खयाल नहीं आता । रोज़ लोगोको मरते हुए देखता है, रोज़ बूढ़ोंको असह्य कष्ट उठाते देखता है ; पर आप नहीं समझता कि, मेरी भी यही गति होनेवाली है ! उल्टा हर साल जन्मतिथिको वर्ष-गौठका उत्सव करता है । मित्रों और रिश्तेदारोंको निमन्त्रण देता है । गाना बजाना और नाच रंग कराता है । कौसी बात है, जहाँ रंज करना चाहिये, वहाँ नादान मनुष्य खुशी मनाता है ! उसे समझना चाहिये, कि हर सालगिरहको उसकी उम्रका एक साल कम होता है । महात्मा सुन्दर दासजीने क्या खूब कहा है :—
जवतें जनम लेत, तबही तें आयु घटे । माई तो कहत, मेरो बड़ो होत जात है ॥ आज और काल और दिन-दिन होत और । दौरयो दौरयो फिरत, खेलत और खात है ॥ बालपन बीत्यो, जब यौवन लाग्यो है । यौवनहु बीते बूढ़ो डोकरो दिखात है ॥ “सुन्दर” कहत, ऐसे देखत ही बूझिगयो । तेल घटि गये; जैसे दीपक बुझात है ॥
प्राणी जबसे जन्म लेता है, तभीसे उसकी उम्र घटने लगती है । माँ समझती है कि, मेरा ठाल बढ़ा होता जाता है । दिन-दिन उसके रङ्ग बदलते हैं । बचपनमें खाता खेलता और भागा फिरता है । बचपनके बीतते ही जवानी आ जाती
( ३६४ )
है और जवालीके बीतते ही बुढ़ापा आ जाता है और वह बूढ़ा ढोकरा खा दीखने लगता है। सुन्दरदास कहते हैं कि, देखते-देखते जिस तरह तेज घट जानेसे बिरागु बुझ जाता है, उसी तरह वह बुझ जाता है; यानी मर जाता है।
छप्पय ।
यस्यो जन्मको मृत्यु, जरा यौवनको यास्यो ।
यसिवैको सन्तोष, लोभ यह प्रगत प्रकास्यो ॥
तैसेही समष्टि यसित, बनिता विलास वर ।
मत्सर गुण यसिलेत, यसत बनको भुजंगवर ॥
रूप यसित किये इन दुर्जनन, कियों चपलता धन यसित ।
कछुहू न देख्यो बिन यसित जग, याही तें चित अति असित ॥१०४॥
104. Birth is threatened by death; youth which is transitory like lightning, by old age; contentment by greed for wealth; mental peace by the strong allurements of women; good qualities by jealous persons; forests by serpents and wild animals; kings by wicked courtiers and wealth and power by shortness of duration. What good thing exists there which does not lie in the clutches of something else capable of destroying it?
आविष्यायिशतेर्जनस्य विविधैरारोग्यमुन्मूल्यते
वत्सरीयत्र पतन्ति तत्र विद्वत्तद्वारा इव व्यापदः ॥
जातं जातभवन्यमाशुविवस्संभृत्युः करोत्यात्मसात्तर्क
नाम निरंकुशेन विधिना यन्निर्मितं सुस्थितम् ॥१०५॥
( ३६५ )
सैकड़ों मानसिक और शारीरिक रोग स्वास्थ्यका नाश कर डालते हैं। जहाँ सम्पत्ति और प्रभुता है, वहाँ विपत्ति दरवाजा तोड़कर चोरकी तरह चढ़ाई करती है। जो जन्म लेता है, उसे मृत्यु शीघ्र ही ज्वरदंती अपने जाबड़ोंमें फँसा लेती हैं; तब निरङ्कुश विद्याताने सदा स्थायी रहनेवाली कौनसी चीज बनाई है ? || ०५ ||
मनुष्य-शरीर शर्माओंका घर है। मानसिक और कायिक रोग सदा उसके भीतर डेरा डाले रहते और स्वास्थ्यका नाश करते रहते हैं। सम्पत्ति पर विपत्ति सदा दृष्टि लगाये खड़ी रहती है और जरासा भी मौका पाते ही दरवाजा तोड़ कर उसका विनाश कर देती है। जन्म लेनेवालेके सिर पर मौत सदा मँडराया करती है एवं दाँव-घात देखती रहती है और जब मौका पाती है, उसे अपने पञ्चोंमें फँसा लेती है। सारांश यह कि, शरीरके साथ रोग, सम्पत्तिके साथ विपत्ति, जन्मके साथ मृत्यु, संयोगके साथ वियोग, सुखके साथ दुःख और जवानीके साथ बुढ़ापा प्रभृति एक दूसरेके नाशक विद्याताने लगा रखे हैं। विद्याताने कोई भी चीज सदा स्थायी नहीं बनाई; जो कुछ बनाया है वह चन्द्रोत्ता और नाशमान बनाया है।
संसारकी असावता देखकर, मनुष्यको अपने तर्ज, इस संसारमें, पाहुनेकी तरह समझना चाहिये। जिस तरह पाहुना