वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जायगा ; जल्दी थोड़े ही हैं । यदि आपको मरनेकी ही याद होती, तो ऐसा न कहते । आज दवाके लिये आपको मरनेकी याद आई है । जिस तरह दवाकी योगनाशके लिये ज़रूरत है ; उसी तरह भजनपूजनकी जन्म-मरणका फन्दा काटनेके लिये ज़रूरत है । ऐसा न हो कि, पशु-यौनि मिल जाय और सारा गुड़ गोबर हो जाय ।” आज स्त्रीका उपदेश लग गया । खेटको वराग्य हो गया । खेतानौने उसे दवा पिला दी और वह अच्छा भी हो गया । उसी दिनेसे उसने ईश्वर-भजनमें लौ लगादी । वह और सब भूला, पर ज़िन्दगी भर मौत और ईश्वरको न भूला ।
मौतको हरदम याद रखो ।
एक बाढ़शाहने अपने दरबार और बैठनेके स्थानोंमें कुम्बे बनवा-रक्खी थीं । वह चाहता था कि, मैं हरदम कुम्बों को देखकर मौत को न भूलूँ । मौतकी याद रहनेसे पापोंसे बचा रहूँगा और ईश्वरको न भूलूँगा । हमारे यहाँके अनेक सच्चे सिद्ध अकसर श्मशान भूमिमें ही अपना डेरा रखते हैं । सारांश यह, मनुष्यको अपनी मौतकी याद सदा रखनी चाहिये, ताकि संसारसे वैराग्य होकर ज्ञान हो और ज्ञानसे मोक्ष मिले । महात्मा कबीरने पूर्व ज़बर्दस्त चेतावनी दी है :—