भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 464

( ३५० )

लौजिये । ऐसा न हो कि, आप सोना न बनावें और यह पारख-मणि पहले ही आपसे छीन ली जाय । इस शरीरका बारम्बार मिलना कठिन है। ८४ लाख योनियों भोगनेके बाद यह मनुष्य-चोला मिला है। इस बार यदि इससे काम न लिया जायगा, तो फिर चौरासों लाख योनियोंमें जन्म-मरण होनेपर यह मनुष्य-चोला मिलेगा ; इसलिये दो बार घड़ी तो सब तरफसे मनको हटाकर परमात्माकी याद किया करो । लौ उससे बार बार कहती, पर वह सेठ उसकी बात टाल देता ।

एक दिन सेठ बीमार हो गया । उसने सेठानीसे वैद्यके बुलानेको कहा । सेठानीने वैद्यको बुलाया । वैद्यने नाड़ी नज्ज देख, रोगका हाल पूछ, दवाका नुसखा लिख दिया और सेवन-विधि बताकर चला गया । सेठानीने पंसारीके यहाँ से दवा मँगा, आठेमें रख दी । दिन-भर हो गया, पर सेठको दवा न दी । सन्ध्या-समय सेठने कहा—“क्या दवा नहीं मँगाई गई ?” सेठानीने कहा—“जी, दवा तो मँगाली है, पर वह रखी है उस ताकमें ।” सेठने पूछा—“अबतक दी क्यों नहीं ?” सेठानीने कहा—“जल्दी क्या है ? आज नहीं तो कल, नहीं तो परसों दे दूँगी । कभी न कभी देही दूँगी ।” सेठने कहा—“अगर मैं मर गया, तो दवा फिर कौन काम आवेगी ?” सेठानीने कहा—“मरनेको तो आप मानते ही नहीं । मैं जब-जब भगवत्-भजन करनेको कहती हूँ, तब-तब आप कह देते हैं कि, देखा