भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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तो, बचपनमें ही ईश्वर-भजन करो। बचपनमें यदि ऐसा सौभाग्य न हो, तो जवानीमें तो न रूको। जवानी इसके लिये अच्छा समय हैं। उस अवस्थामें शक्ति रहती है। जवानीमें ईश्वर-भक्ति करनेवाला निश्चय ही मोक्ष या स्वर्ग पाता है। कहा है :—

दानं दरिद्रस्य प्रभोश्च शान्तिः

यूनां तपो ज्ञानवताच्च मौनम् ।

इच्छा निवृत्तिश्च सुखासितानां

दया च भूतेषु दिवं नयन्ति ॥

दरिद्रताका किया दान, निग्रह अनुग्रहकी शक्ति होनेपर क्षमा, जवानीका किया तप, विद्वान् होकर चुप रहना, सुख-भोगकी सामर्थ्य होनेपर इच्छाओंको रोक लेना और प्राणियों पर दया करना—ये स्वर्गकी प्राप्ति कराते हैं।

ईश्वर-भजनमें आज-कल मृत करो।

एक धनवान सदा घर-धन्योमें लीन रहता था। उसकी स्त्री उससे बहुत-कुछ कहती कि, हे स्वामी ! यह शरीर विषय-भोगोंके लिये नहीं, बल्कि परमात्माकी भक्तिके लिये मिला है। इसे पारस-मणि समझकर, इससे मोक्ष-रूपी सोना बना

इती (२)

एक

ता, व के रन्नु सत, रन्नु रना

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