भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हो जायगा, तो उसके बाद हम सब गृहस्थीके भगड़े छोड़ भगवत् भजन करेंगे, वे इस तरहके विचार किया ही करते हैं कि, इतने में उनका समय पूरा हो जाता है और काल उनका चोटा पकड़ कर उन्हें लेजाता है। उस वक्त वह बहुत पछताते और सिर धुनते हैं, लेकिन उस समय हो क्या सकता है ? उस समय उनकी गति उस भौरैकी सी होती है, जो कमलके मुखमें बन्द होकर कहता है :—

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ।

भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजालम् ॥

इत्थं विचिन्तयति कोशागते द्विषेपे ।

हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार ॥

बड़े-बड़े शालके लहड़ोंको छेद डालनेकी शक्ति रखनेवाला भौरा, प्रेमके सारे, कोमल कमलमें बन्द हो जाता है। रात हो जाती है और भौरा कमलके भीतर बैठा हुआ विचार करता है :—“अब रातका अवसान होगा, सवेरा होगा, सूरज उदय होगा और यह कमल खिल जायगा ; तब मैं निकल जाऊँगा। अब रात-भर यहीं आनन्द करूँ।” वह तो ऐसे विचार करता ही रहता है, कि जड़ूली हाथी कमलको उखाड़कर मुँहमें रख लेता है और भौरैके मन-की-मनमें ही रह जाती है। यही वंशा संसारी विषय-लोलुपों की है ! वह विचार बांधा ही करते हैं और काल उन्हें मुँहमें धर लेता है। अतः हो सके