भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बीती सो बीती, अब तो होश करो !

भाइयो ! बीतीसो बीती, अब तो चेत करो और प्रभुसे लौ लगाओ । आज-कल मत करो, नहीं तो पछताओगे । अन्त समय पछतानेसे कोई लाभ न होगा । जो लोग विचार ही विचार करते रहते हैं, वे धोखेमें रह जाते हैं और काल एक दिन अबानक आकर उनकी चोटी पकड़ लेता है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं :—

गये पलट आवें नहीं, सो कर मन पहचान ।

ब्राजु जोई सोई कालुहि है, तुलसी भर्म न मान ॥

रामनाम रटिबो भलो, तुलसी ख़ता न खाय ।

लरिकाईं तैं पैरिबो, धोखे बूढ़ि न जाय ॥

नदीकी जो धार चली गई है, लौटकर नहीं आयेगी । जो दिन चले गये हैं, वापस नहीं आयेंगे । जो दिन आज हैं, वही कल है । कल कोई नई बात नहीं हो जायगी । अतः जो कल करना है, उसे आजही करो ; और जो आज करना है, उसे अभी करो ; क्योंकि यदि पल भरमें प्रलय हो गई—आप चले बसे, तो फिर कब करोगे ? वचपनसे ही राम नाम रटना अच्छा है । जो लोग वचपनसे ही तेरन्ध सीख लेते हैं, धोखेसे नहीं डूबते । जो लोग यही विचार किया करते हैं, कि अमुक काम

इती (२)

एक

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