भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 458

( ३४६ )

हैं और उस ध्यानमें इतने मग्न हो जाते हैं, कि उन्हें अपने तनोबदनकी भी सुख नहीं रहती। उनको भीतर-ही-भीतर उस ब्रह्मके ध्यानसे जो आनन्द बोध होता है, उससे उनकी आँखोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। पक्षी उनकी गोद में निडर बैठे हुए उन आँसुओंको पीते हैं। उन्हें कुछ खबर नहीं, कि पक्षी गोदमें बैठे हैं या क्या कर रहे हैं। वे तो आनन्दमें बेसुख रहते हैं। यही आनन्द परमानन्द है; इससे परे और आनन्द नहीं। जिनको यह सच्चा आनन्द मिलता है, वही सच्चे भाग्यवान हैं। एक वह है और एक हम अभागे हैं, जो रात-दिन मनोरथांके महल गढ़ा करते हैं—रात-दिन मिथ्या कल्पनायें किया करते हैं। इन शोखबिल्लीके से गढ़न्तोंसे हमें कोई लाभ नहीं—इन भूटे खयाली बुलावोंके पकानेमें हमारा दुष्प्राप्य जीवन वृथा नष्ट होता है !

जो मनुष्य मानव-चोला पाकर परमात्माका भजन नहीं करते, परमात्माके दर्शनोंकी खेष्टा नहीं करते—उनका जीवन वृथा है। इसलिये उस्ताद ज़ौकने कहा है :—

दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमनाये विसाल ।

चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीदकी हसरत नहीं ॥

वह दिल ही नहीं, जिसे तेरे पानेकी इच्छा न हो और वह आँख ही नहीं, जिसे तेरे दर्शनकी लालसा न हो ।