वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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आशाफ़ाँसी काट, चिच्च तू निर्मल हवैरे ।
साधन साधि समाधि, परम निज पदको हवैरे ॥
करि रे प्रतीति मेरे बचन, डुरिरे तू इह ओरको ।
छित यहै यहै दिनहूँ भल्यो, निज राखै कछु भोरको ॥१०२॥
102. The various kinds of sensual pleasures are liable to destruction. They are the causes of worldly bondage, what for, O men, then do you wander about so busily? If you trust upon my word, then it is better for you to fix your mind, made pure by the calming down of the hundredfold network of hopes, in contemplation within your own Self for the extermination of your desires.
धन्यानां गिरिकन्दरे निवसतां ज्योतिः परं ध्यायता-
मानन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशंकमङ्केशयाः ॥
ब्रह्माकं तु मनोरथोपरचितभासादवापीत-
क्रीडांकाननकैलिकौतुकजुषामायुः परिचीयते ॥१०३॥
वे धन्य हैं, जो पर्वतोंकी-गुफाओंमें रहते हैं और परमब्रह्मकी ज्योतिका ध्यान करते हैं, जिनके आनन्दाश्रुओंको उनकी गोदमें बैठे हुए पत्नी निर्भयतासे पीते हैं । हमारी जिन्दगी तो मनोरथोंके महलकी नावड़ीके किनारेके क्रीडा-स्थानमें लीलायें करते हुए ही बुथा बीतती है ॥१०३॥
मतलब यह, कि वे लोग सफल-काम हैं, जो पहाड़ोंकी गुफाओंमें बैठे हुए परमात्माका ज्योतिका ध्यान करते रहते