भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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द्वार करते हैं, वे ही कल आपको देखकर नाक भौं सिकोड़ेगे। फिर भला, आप ऐसी नश्वर निकम्मी काया पर क्यों इतना अभिमान करते हैं? आप अहङ्कारको त्यागिये और अपने लिये उस खिलाड़ीका एक मिट्टीका पुतला-मात्र समझिये। सबकी शुभ कामना और परोपकार कीजिये, और एकमात्र अपने बानेवालेसे ही दिल लगाइये। इसीमें आपका कल्याण है। यह जगत् कुछ भी नहीं, कोरा भ्रम है। यह मृगमरीचिका या स्रम कीसी माया है। इस पर ज्ञानी नहीं भूलते। महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :—

कोऊ रुप फूलन की सेज पर सुतो आइ । जब लग जाग्योतौ लों, अति सुख मान्यो है ॥ नींद जब आई, तब वाही कैं स्वपन भयो । जब प्रयो नरकके कुण्डमें, चूँ जान्यो है ॥ अति दुःख पावे, पर निकस्यो न कयूँ ही जाहि । जागि जब प्रयो, तब स्वपन बखान्यो है ॥ यह झूठ वह झूठ, जाग्रत स्वपन दोऊ । “सुन्दर” कहत, ज्ञानी सब भ्रम मान्यो है ॥

व्यपय ।

अति चंचल ये भोग, जगतहूँ चंचल तैसों । तू क्यों भटकत मूढ़ जीव, संसारी जैसों ॥

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