भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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नाशमान् है। आप सदा इस संसारमें नहीं रहेंगे। आपकी जिन्दगीका कोई भरोसा नहीं। आपका जो दम आता है, उसे ही गनीमत समझिये। आप एक क्रुद्ध रखकर, दूसरा क्रुद्ध रखनेकी भी दृढ़ आशा न कीजिये। आपका जीवन हवाके भोंकोंसे छिन्न-भिन्न मेघोंके समान है। अभी घटा छा रही थीं; देखते-देखते हवा उन्हें कहाँ-का कहाँ उड़ा ले गई; आकाश साफ हो गया। यह सारा संसार, संसारके सुख-भोग और स्त्री-पुत्र धन-रत्नादि सभी स्वप्नकी सी माया है। यह दुनिया मुसाफिरखाना है। रोज़ अनेक आदमी मुसाफिरखाने, सराय या धर्मशालाओंमें आते और जाते हैं; सदा उनमें कोई नहीं रहता। वे जिस तरह एक दिन या दो तीन दिन ठहर कर चले जाते हैं; उसी तरह आपको भी, इस दुनिया-रूपी सरायमें चन्द रोज़ क़याम करके, आगे जाने होगा। ये सारे सामान यहाँ के यहीं रह जायेंगे। ये सब पैसे हो रहेंगे, पर आप न रहेंगे। इसलिये आप होशियार रहिये, भूलिये मत। आप आज जिस जवानी पर इतने इतराते और इतने श्रद्धार-बनाव करते हैं, यह भी चन्दरोज़ा है। यह चार दिनकी चाँदनी है। इसके बाद अँधेरी रात निश्चयही आवेगी; अर्थात् इसके बाद बुढ़ापा अवश्य आवेगा। उस समय आपको यह अकड़, यह उल्लू-कुद, यह पेटना, यह सूठे मरोड़ना—सब हवा हो जायगा। आप शीघ्र ही लाठी टेक कर चलने लगेगे। आपका रूप-लावण्य नाश हो जायगा। जो लोग आपको खूबसूरत समझकर आज

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