वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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sheet in the same tattered condition, who is free from cares and eats food easily got by begging, who sleeps in a cremation-ground or a forest, who is indifferent to friends as well as to foes, who sits in contemplation in a lonely cottage and whose vanity and passions have been totally destroyed,
भोगा भंगुरवृत्तयो बहुविधास्तैरेव चायं भव-
स्तत्कस्यैव कृते परिश्रमतरे लोका कृतं चेष्टितैः ॥
आशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां
कायोच्छितिवशे स्वधामनि यदि श्रद्धेयसम्पद्भूचः ॥१०२॥
नाना प्रकारके विषय-भोग नाशमान और संसार-बन्धनके कारण हैं, इस बातको जान कर भी मनुष्यो ! उनके चक्रमें क्यों पड़ते हो ? इस चेष्टासे क्या लाभ होगा ? अगर आपको हमारी बातका विश्वास हो, तो आप अनेक प्रकारके आशा-जालके टूटनेसे मुद्ध हुए चित्तको सदा कामनाशक स्वयंप्रकाश शिवजीके चरणोंमें लगाओ। ( अथवा अपनी इच्छाओंके समूल नाश करनेके लिए, अपने ही आत्माके ध्यानमें मग्न हो जाओ ) ॥१०२॥
आप आज जिन विषय-सुखोंको देखकर फूँले नहीं समाते, वे विषय-सुख सदा आपके साथ नहीं रहेंगे। वे आज हैं, तो कल नहीं रहेंगे। वे बिजलीकी चमकके समान चञ्चल हैं, अभी बिजली चमकी और फिर नहीं। आप ऐसे नश्वर, असार, क्षणस्थायी सुखों पर मत भूलो। होश करो ! आपकी काया