भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ३५८ )

बाल्मीकि ऋषि हो गये । पद्मयोगिनेसे पैदा हुए ब्रह्मा, कैवर्त्ति से पैदा हुए व्यासजी, उर्वशीसे पैदा हुए वशिष्ठजी और हिरणी से पैदा हुए ऋषि भृङ्गी सत्संगसे ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए ; अतः महापुरुषोंका संग करना चाहिये । “सत्संग” भवसागरसे पार करनेके लिये नौका-स्वरूप है । कहा है :—

तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते,

परिहर चिन्तां नश्वरचित्ते ।

क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका

भवति भवार्थोवतरणे नौका ॥

इमेशा तत्त्वकी चिन्तना कर, चञ्चल धनकी चिन्ता छोड़ । यह जगत् अल्पकालीन है ; केवल सज्जनोंकी संगति ही भव-सागरके पार जानेके लिये नावके समान है ।

इस संसार-वृक्षके जितने फल हैं, सभी प्राणीके नाश करने वाले और उसे सदा दुःखोंके गर्तमें पटक रखनेवाले हैं ; केवल दो फल अमृत-समान हैं ; कहा है :—

संसार-विष-वृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमं ।

‘काव्यामृत रसास्वादं ब्राह्मणः सज्जनैः सह ॥

इस संसार-रूपी विष-वृक्षके दो फल अमृतके समान हैं :—

(१) काव्यरूपी अमृतका रसास्वादन करना, (२) साधु पुरुषों की सद्गति करना ।

( ३५६ )

शंकराचार्यजीने कैसा अच्छा उपदेश दिया है ! इसमें संसार-सागरसे पार होनेका सारा मसाला है :—

संगः सत्सु विधीयतां, भगवतोभक्तिर्दृढा धीयतां, शान्त्यादिः परिचीयतां, दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम् । सद्भिद्यो ह्युपसर्ज्यतां, प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां, वक्षैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यम् समाकश्यताम् ॥

साधु पुरुषोंका संग करना चाहिए । भगवानमें दृढ़ भक्ति करनी चाहिये । क्षमा और दम प्रभृतिका अभ्यास करना चाहिये । संसार-बन्धनके कारण “कर्म—सकाम कर्मोंको” शीघ्र त्यागना चाहिये । सच्चे विद्वानोंकी सेवा करनी चाहिये और उनकी पादुकाएँ उठानी चाहिये । ब्रह्म-बोधक एकाक्षर प्रणव “ॐ” का जाप करना चाहिए और वेदके शिरोवाक्य “वेदान्त” को सुनना चाहिये ।

वाह ! क्या लूब कहा है ! जो इस वचन पर अमल करेगा, उसे परमानन्दकी प्राप्ति क्यों न होगी ? अवश्य होगी ।

व्यप्यय ।

योगी जग विसराय, जाय गिरिगुहा वसत है ॥ करत ज्योतिको ध्यान, मगन आसू वरषत है ॥ खगकुल बैठत अंक, स्पियत निःशंक नयनजल । धनि धनि है वे धीर, धर्यो जिन यह समाधिबल ॥

( ३६० )

हम सेवत बारी बाग सर, सरिता बापी रूपतट । खोवत हैं योंहीं आयुको, भये निपटही नीरघट ॥१०३॥

103. Worthy of all praise are those who live in the caves of mountains and contemplate upon the Supreme Light and whose tears of joy are drunk by birds sitting fearlessly in their laps, while our lives are passing fruitlessly away in pursuing frolicksome avocations in the play-gardens, situated on the banks of the tank, belonging to the spacious mansion of Desire.

  • आत्रांत मरणेन जन्म जरया विद्युच्चल यौवन संतोषो धनलिप्सया शमसुखं प्रौढांगनाविभ्रमैः ॥ लोकैर्मत्सरिभिर्गुणा वनसुखो व्यालैर्नृपा दुर्जनै- रस्यैर्येण विभृतिरप्यपहता प्रस्तं न किं केन वा ॥१०४॥

मृत्युने जन्मको प्रस रक्खा है, बुढ़ापेने बिजलीके समान चन्द्र-चल युवावस्थाको प्रस रक्खा है, धनकी इच्छाने सन्तोषको प्रस रक्खा है, स्त्रियोंके हावभावोंने मानसिक शान्तिको प्रस रक्खा है, जलनेवालोंने गुणोंको प्रस रक्खा है, सर्प और जंगली जानवरोंने वनको प्रस रक्खा है, दुष्टोंने राजाओंको प्रस रक्खा है, अस्थिरता या चन्द्र-चलताने धनैश्वर्य्यको प्रस रक्खा है ; तब ऐसी कौनसी अरुच्छी चीज है, जो किसी दूसरी नाशक चीजके चंगुलमें नहीं है ? ॥१०४॥

❖ आ-समन्तांत प्रातं-प्रस्तं ।

( ३६१ )

खुलासा यह है, कि जन्मको मृत्युका भय है, जवानीको खुड़ापेका भय है, सन्तोषको लोभका भय है, शान्तिको ख़ियोकें हावभाव और विलासोंका भय है, गुणोंको उनसे जलने या कुड़नेवालोंका भय है, वनमें सर्प और हिंसक पशुओंका भय है, राजाओंमें दुष्ट दरबारियोंका भय है, धन और ऐश्वर्यमें क्षणभंगुरताका भय है। संसारमें ऐसी कोई अच्छी वस्तु नहीं है, जिसे किसीका भय न हो। मतलब यह है कि, संसार और संसारके सभी पदार्थ नाशमान हैं। ऐसी कोई वीज नहीं है, जिसका काल नाश नहीं कर देता, अथवा जिसे किसी तरहका भय नहीं है।

संसारकी यह दशा है, तब भी तो मनुष्य चेत नहीं करता, यही तो आश्चर्य की बात है ! अज्ञानी मनुष्य, मोहवश, अपना हानि-लाभ नहीं देखता ; संसारकी कूटी मायामें फँसा रहता है। तुलसीदासजीने ठीक ही कहा है :—

करत चातुरी मोहवश, लसत न निज हित हान ।

शूक मर्कट इव गहत हठ, तुलसी परम सुजान ॥

दुखिया सकल प्रकार शठ, समुक्ति परत तोड़ नाहिं ।

लसत न कण्टक पीन जिमि, ब्रशन भसत भ्रम नाहिं ॥

विषयोंके संसर्गसे मनुष्यके मनमें कामना—इच्छा पैदा होती है। जब इच्छा पूरी नहीं होती, तब क्रोध होता है और

( ३६२ )

कोधसे मोहकी उत्पत्ति होती है। मोह होनेसे प्राणीको अपना हित या परलोककी हानि नहीं दिखती। राग द्वेष प्रभृतिके कारण उसमें ज्ञानदृष्टि नहीं रहती ; पर पढ़ने-लिखनेके कारण वह अपने तर्ह परम चतुर समझता है और जिस तरह हठ करके तोता बहेलियेके फन्देमें आप ही फँस जाता है और पीजरेमें कैद हो जाता है, तथा बन्दर छोटे मुँहकी डिलियामें रोटीके लिये हाथ डालकर बन्दरवालेके कून्जमें हो जाता है ; उसी तरह विषयी पुरुष, विषयोंके ठालचमें आकर, अपने तर्ह संसार-बन्धनमें फँसा लेता है।

मनुष्य भूख, प्यास, रोग, शोक, दृदिता, प्रिय-विद्योग, बुढ़ापा, जन्म-मरण, चौरासी लाख योनियोंमें दुःख-भोग तथा नरक प्रभृतिसे हर तरह दुखी है, उसे जरा भी सुख नहीं है, पर वह मोहके मारे ऐसा अन्धा हो रहा कि, उसे कौटिमें लगे चारोंके लिये फसने वाली मछलीकी तरह कुछ भी नहीं सूझता। जिस तरह मछलीको रोटीका टुकड़ा प्यारा है ; उसी तरह मनुष्य को विषय-भोग प्यारा है। जिस तरह मछलीको काँटा है, उसी तरह मनुष्यको ममता काँटा है। मतलब यह है, अज्ञानी मनुष्य विषय-रूपी चारोंके लोभसे ममताके कौटिमें फँसकर अपना नाश करता है ; पर मज्ञा यह कि वह दुःखको दुःख नहीं समझता ; तरह-तरहके भयोंसे घिरा हुआ नाना प्रकारके संकट झेलता है ; मछली, तोते और बन्दरकी तरह बन्धनमें फँसता है, पर निकलना नहीं चाहता। इन दुःखोंका उसे

( ३६३ )

बुरा भी खयाल नहीं आता । रोज़ लोगोको मरते हुए देखता है, रोज़ बूढ़ोंको असह्य कष्ट उठाते देखता है ; पर आप नहीं समझता कि, मेरी भी यही गति होनेवाली है ! उल्टा हर साल जन्मतिथिको वर्ष-गौठका उत्सव करता है । मित्रों और रिश्तेदारोंको निमन्त्रण देता है । गाना बजाना और नाच रंग कराता है । कौसी बात है, जहाँ रंज करना चाहिये, वहाँ नादान मनुष्य खुशी मनाता है ! उसे समझना चाहिये, कि हर सालगिरहको उसकी उम्रका एक साल कम होता है । महात्मा सुन्दर दासजीने क्या खूब कहा है :—

जवतें जनम लेत, तबही तें आयु घटे । माई तो कहत, मेरो बड़ो होत जात है ॥ आज और काल और दिन-दिन होत और । दौरयो दौरयो फिरत, खेलत और खात है ॥ बालपन बीत्यो, जब यौवन लाग्यो है । यौवनहु बीते बूढ़ो डोकरो दिखात है ॥ “सुन्दर” कहत, ऐसे देखत ही बूझिगयो । तेल घटि गये; जैसे दीपक बुझात है ॥

प्राणी जबसे जन्म लेता है, तभीसे उसकी उम्र घटने लगती है । माँ समझती है कि, मेरा ठाल बढ़ा होता जाता है । दिन-दिन उसके रङ्ग बदलते हैं । बचपनमें खाता खेलता और भागा फिरता है । बचपनके बीतते ही जवानी आ जाती

( ३६४ )

है और जवालीके बीतते ही बुढ़ापा आ जाता है और वह बूढ़ा ढोकरा खा दीखने लगता है। सुन्दरदास कहते हैं कि, देखते-देखते जिस तरह तेज घट जानेसे बिरागु बुझ जाता है, उसी तरह वह बुझ जाता है; यानी मर जाता है।

छप्पय ।

यस्यो जन्मको मृत्यु, जरा यौवनको यास्यो ।

यसिवैको सन्तोष, लोभ यह प्रगत प्रकास्यो ॥

तैसेही समष्टि यसित, बनिता विलास वर ।

मत्सर गुण यसिलेत, यसत बनको भुजंगवर ॥

रूप यसित किये इन दुर्जनन, कियों चपलता धन यसित ।

कछुहू न देख्यो बिन यसित जग, याही तें चित अति असित ॥१०४॥

104. Birth is threatened by death; youth which is transitory like lightning, by old age; contentment by greed for wealth; mental peace by the strong allurements of women; good qualities by jealous persons; forests by serpents and wild animals; kings by wicked courtiers and wealth and power by shortness of duration. What good thing exists there which does not lie in the clutches of something else capable of destroying it?

आविष्यायिशतेर्जनस्य विविधैरारोग्यमुन्मूल्यते

वत्सरीयत्र पतन्ति तत्र विद्वत्तद्वारा इव व्यापदः ॥

जातं जातभवन्यमाशुविवस्संभृत्युः करोत्यात्मसात्तर्क

नाम निरंकुशेन विधिना यन्निर्मितं सुस्थितम् ॥१०५॥

( ३६५ )

सैकड़ों मानसिक और शारीरिक रोग स्वास्थ्यका नाश कर डालते हैं। जहाँ सम्पत्ति और प्रभुता है, वहाँ विपत्ति दरवाजा तोड़कर चोरकी तरह चढ़ाई करती है। जो जन्म लेता है, उसे मृत्यु शीघ्र ही ज्वरदंती अपने जाबड़ोंमें फँसा लेती हैं; तब निरङ्कुश विद्याताने सदा स्थायी रहनेवाली कौनसी चीज बनाई है ? || ०५ ||

मनुष्य-शरीर शर्माओंका घर है। मानसिक और कायिक रोग सदा उसके भीतर डेरा डाले रहते और स्वास्थ्यका नाश करते रहते हैं। सम्पत्ति पर विपत्ति सदा दृष्टि लगाये खड़ी रहती है और जरासा भी मौका पाते ही दरवाजा तोड़ कर उसका विनाश कर देती है। जन्म लेनेवालेके सिर पर मौत सदा मँडराया करती है एवं दाँव-घात देखती रहती है और जब मौका पाती है, उसे अपने पञ्चोंमें फँसा लेती है। सारांश यह कि, शरीरके साथ रोग, सम्पत्तिके साथ विपत्ति, जन्मके साथ मृत्यु, संयोगके साथ वियोग, सुखके साथ दुःख और जवानीके साथ बुढ़ापा प्रभृति एक दूसरेके नाशक विद्याताने लगा रखे हैं। विद्याताने कोई भी चीज सदा स्थायी नहीं बनाई; जो कुछ बनाया है वह चन्द्रोत्ता और नाशमान बनाया है।

संसारकी असावता देखकर, मनुष्यको अपने तर्ज, इस संसारमें, पाहुनेकी तरह समझना चाहिये। जिस तरह पाहुना

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जहाँ कहीं जाता है और जहाँ ठहरता है, वहाँ के लोगोंसे दिल नहीं लगाता ; उसी तरह समझदारोंको इस दुनियासे दिल न लगाना चाहिये ।

जिसको रहना उत घर, सो क्यों तोड़े मित्र । जैसे पर-घर पाहुना, रहै उठाये चित्त ॥ इत पर-घर उत है घरा, बनिजन आये हाट । कर्म करीना बेचिके, उठि करि चाले बाट ॥ मेरा संगी कोई नहीं, सबै स्वार्थी लोग । सुन परतीति न जपजे, जीव विश्वास न होय ॥ “कबिरा” ऐसा संसार है, जैसा सैमल-फूल । दिन दशके व्यौहारमें, मूठे रंग न भूल ॥

मनुष्यका अपना घर वह है जहाँसे वह आया है, यह नहीं ; अतः उसे अपने उस घरसे दिल न हटाना चाहिये । इस घरमें आकर मिहमानकी तरह रहना चाहिये और मिहमानकी तरह ही अपना दिल उठाये रखना चाहिये ।

यह पराया घर है और वह अपना घर है । यहाँ हाटमें अपना व्यवसाय करने आये हैं । हाटमें सौदा बेच कर अपनी राह लगेगे ; यानी इस दुनियामें अपने कर्माँका फल भोगकर यहाँसे चले जायेंगे ।

इस दुनियामें अपना कोई साथी नहीं है । सभी मतलबी यार हैं, और मतलबके लिये ही हमारे बन रहे हैं । सुनकर

( ३६७ )

प्रतीत नहीं होती और ज़ोमें विश्वास नहीं आता ; पर बात सच्ची है ।

कबीरदासजी कहते हैं,—यह संसार सेमलके फूलकी तरह है । दश दिनके व्यवहार और मेल-जोलखे मूठे रंग पर न भूलना चाहिये ।

सारंगश यह है कि, यह दुनिया परायार घर है और प्राणी-मात्र यहाँ मिहमान हैं ; अथवा यह संसार सराय है और हमलोग मुसाफिर हैं । यदि हम पाहुने हैं तो ; और यदि हम मुसाफिर हैं तो—दोनों हाथतोंमें ही—हमें इस दुनियासे दिल न लगाना चाहिये । हम जहाँसे आये हैं, अथवा जहाँ हमारा घर है, हमें अपना दिल वहाँके लिये ही उठाये रहना चाहिये ।

—————— दुनिया गोरख-धन्धा है । —○○○—

यह संसार बिल्कुल मिथ्या और असार है ; इसमें कुछ भी तत्त्व नहीं है । केलेके खंभे और लहसनको ज्यों-ज्यों छीलते जाइये, त्यों-त्यों उनके भीतरसे सिवां पत्तों और छिलकोंके कुछ भी नहीं निकलता । यह जगत् भी उनकी तरह ही सारहीन है । इसमें कुछ भी नहीं है । यह कोरा माया-जाल या घोखा है । इस गोरखधन्धेमें जो फँस जाते हैं, वे बुरी तरह नष्ट होते और अन्तमें पड़ताते हैं । इसलिये भाइयो ! इस माया-जालसे

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निकलनेकी चेष्टा करो । खूब खूबदार रहो ! इस जगत्के सभी सुख-भोग झूठे और प्राणीके पक्षमें अहितकर हैं । मि० आगा हथने थियेटरके गानेके तर्जमें क्या खूब कहा है :—

इस जालमें सब उलझाये, दुनिया है गोरखधन्वा । डाल रखा है सबने गलेमें, लोभ-मोहका फन्दा ॥ ये दुनियाँ हैं बुरका लड़ई; देखके जी ललचाये । ना खाये तौभी पढ़ताये, खाये तो पढ़ताये ॥ फिर भी सकल जगत है अन्ध । इस दुनियाके सुख भी झूठे, इसका प्यार भी झूठा ॥ सावधान हो ! इस ठगनीने बड़ों बड़ोंको लूटा । मूरख ! मत बन इसका बन्दा ॥

यह चोला परोपकार और ईश्वर-भजनके लिये भिला है ।

—◇◇◇◇—

आप जब इस दुनियामें आनेके लिये माँ के गर्भमें थे, तब आपने परमात्मासे प्रार्थना की थी, कि हे नाथ ! मुझे इस नरक-कुण्डसे निकालिये ; मैं दुनियामें जाकर माया-मोहमें न फँसकर, केवल आपको ही परिस्तिश और उपासना तथा जगत्के दूसरे प्राणियोंका उपकार करूँगा ; पर यहाँ आकर

( ३६६ )

बचपन आपने खेल-कूदमें और जवानी लीके साथ पेश-आराम में बिता दी !! क्या आपको ऐसा ही करना चाहिये था ?

यह मंत्रुष्य-बोला इसलिये मिला है, कि मनुष्य । इस जगत्में दूसरों पाणियोंकी शुभचिन्तना करे और अपने कर्म-बन्धन काट कर परमपदकी प्राप्ति करे ; पर लोग तो इसको चमक-दमक कर ऐसे भूल जाते हैं, कि उन्हें अपनी आगेकी सफ़रका खयाल ही नहीं रहता । ऐसा समझने लगते हैं, मानो वह सदा यहीं रहेंगे । यहाँके लिप, जहाँ उन्हें बहुत ही थोड़े दिन रहना होता है, इतारों तरहके सामान करते हैं ; पर आगेकी लम्बी सफ़र के लिये कुछ भी नहीं करते ! यहाँके लिये इतना आड़म्बर और वहाँके लिये कुछ नहीं । यह चतुराई तो अच्छी नहीं मालूम होती । उस्ताद जौक ने कहा है :—

क्या यह दुनियाँ, जिसमें कोशिश हो न दीं के वास्ते ।

वास्ते वों के बी कुछ—या सब यहीं के वास्ते ॥

इस दुनियामें आकर कुछ परलोकके लिये भी करना चाहिये । यह नहीं, कि उधरकी फिक बिल्कुल ही न की जाय ।

हमें सृष्टिके प्रत्येक पदार्थ और नेचरके प्रत्येक कामसे परोपकारकी शिक्षा मिलती है । सूर्य परोपकारके लिये ही आकाशमें प्रमण करता है । चन्द्रमा परोपकारके लिये ही कष्ट सहकर जगत्में शीतल चाँदनी छिड़काता है । सितारे

२५

( ३१० )

अँधेरी रातमें मुसाफिरोंको राह दिखानेके लिये ही रात-भर टिमटिमाते हैं। ध्रुव उत्तर दिशाका ज्ञान कराने और समुद्र के अगाध और अनन्त जलमें जहाजोंको राह दिखानेके लिये ही चमकता है। नदियाँ परोपकारके लिये ही बहती हैं। वृक्ष परोपकारके लिये ही फलते हैं। परोपकारके लिये ही, शेषजीने इस लम्बी-चौड़ी पृथिवीका भार अपने सहस्र फणों पर धारण कर रखा है। कच्छपने, परोपकारके लिये ही शेष समेत पृथ्वीका भार अपनी पीठ पर वहन कर रक्खा है। भगवान्ने परोपकारके लिये ही बारम्बार अवतार लेकर जन्म-मरणका कष्ट उठाया है। शिवि और दक्षोचिने परोपकारके लिये ही अपनी जानें दे दीं। किसी कविने कहा है :—

विरक्षा फलै न आप को, नदी न अचवे नीर । परोपकार के कारणे, सन्तन धरो शरीर ॥ शेष शीश धारे धरा, कहु न अपनो काज । परहित पर सारथी रथी, वाङ्क बने न लाज ॥

किसी जड़ुठमें चूहोंकी एक कृतार चली जाती थी। उनमें एक चूहा अन्ध था। उसके मुखमें एक तिनका पकड़कर, दूसरे चूहेने उसे अपने मुँहमें पकड़ रक्खा था। उसके सहारे अन्ध चूहा भी चला जाता था। यह जानवरोंका हाल है। पशुओंमें भी परोपकार-बुद्धि होती है। जो मनुष्य होकर परोप-

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कार शून्य है, वह पशुओंसे भी गया-बीता है। खासकर मनुष्य- देह तो परोपकारके लिये ही दी गयी है ; अतः मनुष्यको परोप- कार करना ही चाहिये। कहा है :—

परोपकारः कर्तव्यः श्रायौरपि धनैरपि ।

परोपकारंजं पुरयं न स्यात् ऋतुशतैरपि ॥

परोपकारशून्यस्य धिड्मनुष्यस्य जीवितम् ।

यावन्तः पशवस्तेषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥

आत्मार्यं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः ।

परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति ॥

धन और प्राणोंसे परोपकार करना चाहिए ; क्योंकि परोप- कारके पुण्यके बराबर सौ यज्ञोंका भी पुण्य नहीं है।

परोपकार-शून्य मनुष्योंके जानेको भी धिक्कार है ! पशुओं- का चमड़ा भी पराये काम आता है।

अपने लिये इस लोकमें कौन नहीं जीता ? पराये लिये जो जीता है वही जीता है और तो मृतकवत् है।

सौ यज्ञोंका पुण्य भी परोपकार-जन्य पुण्यकी

बराबरी नहीं कर सकता।

एक वैश्यने अपने करोड़ों रुपये यज्ञोंमें खर्च कर दिये। शेषमें वह निर्धन हो गया। उसकी स्त्रीने उसे सलाह दी

( ३७२ )

कि, तुम राजाको अपने दो चार यज्ञोंका फल देकर धन ले आओ, तो शेष जीवन सुखसे कट जाय। वैश्य राजी हो गया। सेठानीने उसे राहमें खानेके लिए नौ रोटियाँ रख दीं। वह वनमें पहुँच कर एक वृक्षके नीचे ठहर गया। वहाँ पानी जोरसे बरसनेके मारे राह न थी। उसी पेड़के खोंठरमें एक कुतिया व्यायी थी। वह वर्षाके मारे नौ दिनसे खूराककी तलाशमें कहीं जा न सकी थी; इसलिये भूखी मरणासन्न हो रही थी। वैश्यने उसे अपनी सब रोटियाँ खिलादीं और आप भूखा रह गया। वह भूखा-प्यासा राजाके पास पहुँचा और उसे अपनी राम-कहानी कह सुनाई। राजाने राज-ज्योतिषीसे पूछा—“इस सेठके कौनसे यज्ञका फल उत्तम है?” ज्योतिषीने कहा—“महाराज! इसने राहमें कुतियाको अपनी रोटियाँ खिलाकर जो उपकार किया है, उसीका फल उत्तम है; आप उसे ही खरीद लीजिये।” वैश्य उस परोपकारके पुण्य-फलको देने पर राजी न हुआ; तब राजाने उसे कई लक्ष सुद्रा देकर विदा किया। सारांश यह, कि संसारमें परोपकार और दयाके समान और पुण्य नहीं है। अतः मनुष्यको निःस्वार्थ भावसे परोपकार करना चाहिये। जो मनुष्य होकर परोपकार नहीं करता, उसका जन्म वृथा है।

‘किसीने कहा है :—

‘जातः कर्मः स एकः पृथुयुवनभरायापितं येन पृष्टं शलायं जन्म ध्रुवस्व प्रमति नियमितं यत्र तेजस्विक्वम् ॥’

( ३७३ )

संजातव्यर्थपन्नाः परहितकरणे नोपरिष्टात्र चाधो ब्रह्मरहोडुम्भरान्तर्मशकवदपरे प्राणिनोजातनष्टाः ।

संसारमें उस प्रसिद्धः कलुषका जन्म ही सफल है, जिसने इस विशाल पृथ्वीका भार उठानेके लिये अपनी पीठ दे रखी है ; और इसी तरह ध्रुवका जन्म प्रशंसनीय है, जिसको बीच में लेकर सप्तश्रषियोंका ज्योति-मण्डल घूमता है । परोपकार करनेमें अशक्य मनुष्योंका जन्म इस ब्रह्माण्डमें गूठके बीचमें रहने वाले उन मच्छरोंके समान वृथा है, जो पंख सहित होनेपर भी कुछ नहीं कर सकते ।

अतः भाइयो ! स्त्री-पुत्र प्रभृतिके लिए अमूल्य जीवन वृथा नाश मत करो । ये आपके कोई नहीं । ये यहीं के साथी और बड़े स्वार्थी हैं ; परलोकमें आपके साथ न जायेंगे ; वहाँ केवल धर्म ही आपके साथ जायगा । मौत आपके लेजानेके लिए आना ही चाहती है । इसलिये चेत करो, आँखें खोलो, अब न सोओ । साँस-साँस पर जगदीशका सुमिरन करो और निष्काम भावले प्राणियों पर दया और परोपकार करो ; क्योंकि मरने पर ये ही आपके काम आयेगे ।

कविता या गानेको चीज़ोंका प्रभाव मनुष्य पर बड़ी जल्दी पड़ता है ; इसीसे हम चार-पाँच चिन्ताकर्षक और मोह-भञ्जन करनेवाले गाने नीचे देते हैं :—

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भजन ( रागविहाग )

हे मन गुमानी ! चेत कर ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर । बीती यह जाती है उमर ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥१॥ नारी नरककी खान है ; जिसपर जगत गलतान है । इसका मज़ा इस आन है ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥२॥ सुत बन्धु माता और पिता ; कुनवा कबीला आशन्नों । सब सुखके साथी हैं तेरे ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥३॥ दुनियां कहौ क्या माल है ; मायाका फैला जाल है । इसपर तू क्या खुशहाल है ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥३॥ कहना मेरा ले मान तू, हरगिज़ न कर अभिमान तू । एक प्रसुको सौंचा जान तू ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥५॥


भजन ।

क्या देख दिवाना हुआ रे ॥ टेक ॥

मादा बनी सारकी सूली, नारी नरकका कूआ रे ॥१॥ हाड़ चाम का बना पींजरा, तामें मनुखों सूआ रे ॥२॥ भाई बन्धु और कुटुम्ब वनेरा, तिनमें पच २ मूआ रे ॥३॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो, हार चला जग जूआ रे ॥४॥

( ३७५ )

भजन ( राग काफी ) ।

नर समझत नाहिं अनारी ॥ टेर ॥ गर्भवसमें उलटो लटक्यो, पायो दुःख अति भारी । जोगसु ! अबके मैं बाहर निकसों, तेरो भजन कहूँ हरबारी ।

पलक नाहिं देउँ बिसारी ॥ १ ॥ जन्म होत माया लिपटायो, भूल गया सुध सारी । भक्ति भावमें चित ना राख्यो, ऐसी कुमत्त बिचारी ।

जन्मकी कर दई ख्वारी ॥ २ ॥ आया था कुछ लाभ करनेको, गँठकी पूँजी हारी । सौदा कर ले राम नामका, आओ शरण गिरधारी ।

भरोसा जिनका है भारी ॥ ३ ॥ श्री सतगुरु तोहि नित समझावें, वे हैं सबके हितकारी । आप तैं औरनको ताँरें, कहै “हरिदास” पुकारी । उम्र योही सुफ्त गुज़ारी ॥४॥

गुज़ल ।

उठ जागरे मुसाफ़िर ! किस नींद सो रहा है ? । जीवन अमूल्य प्यारे, क्यों सुफ्त खो रहा है ? ॥१॥ रहना न यहाँ पे हेगा, दुनियाँ सराय फ़ानी । किसकर नदीमें प्यारे, क्यों मस्त हो रहा है ? ॥२॥

( ३७६ )

ले ले धरमका तोषा, मत भूल ऐ दिवाने ! । नेकी की खेती करले, क्यों पाप बो' रहा है ? ॥३॥ माता पिता वा भाई, होंगे न केई साथी । क्यों मोहरूपी बोम्मा, नाहक केा टो रहा है ? ॥४॥ किरती तेरी पुरानी, हिकमतसे पार करले । ऐ दिल ! अथाह जलमें, तू क्यों डुबो रहा है ? ॥५॥

भजन ( लावनी )

पड़ लोभ मोहके जालमें, नर आयू क्यों खोता है ॥ टेक ॥ यह जग जान रैनका सुपना, जिसकेा कहता अपना-अपना । भूल गया ईश्वरका जपना, फँसा हुआ धन-मालमें । क्या सुखकी नींद सोता है ? ॥ १ ॥

चले अकड़ बन छैल छबीला, अन्त समय सब हा जाय टीला । काम न आये कुटुम्ब-कबीला, भूला जिनके ख्यालमें ।

केई साथी नहीं होता है ॥ २ ॥

अब क्यों सिर धुनि-धुनि पछितावे, रदन करै और रौल मचावे । कुछ नहीं तेरी पार बसावे, चूका पहिली चालमें ।

क्या खड़ा-खड़ा रोता है ? ॥ ३ ॥

समझ सोच कर कदम उठाना, मुश्किल मनुषजनम है पाना । कहै "सुरारी" जो हो दाना, भ्रज हर को हर हाल में ।

क्यों पाप-बीज बोता है ? ॥ ४ ॥

( ३०० )

महात्मा सुन्दरदासजी की भी सुविधे :—

बैरी घर भँहि तेरे, जानत सनेही मेरे । दारा सुत विच तेरे, खोंसि-खोंसि खायँगे । औरहु कुटुम्बी लोग, लूटें चहुँ धोएही ते । मीठी मीठी बात कहि, तोसैं लपटायँगे । संकट परेगो जब, कोई नहीं तेरो तब । धन्तही कठिन, बाकी बेर उठि जायँगे । “सुन्दर” कहत, तातें झूठो ही प्रपञ्च सब । स्वपनकी नाई, यह देखत विलायँगे ॥१॥

घरी-घरी घटत, छीजत जात छिन-छिन । भीजतही गरिजात, माटीको सो ढेल है । सुकृतिके द्वार आई, सावधान कयँ न होइ । बेर-बेर चढ़त न, तियाको सो तेल है । करि ले सुकृत, हरि भज ले अखण्ड नर । याहीमें धन्तर पड़े, यामें ब्रह्म मेल है । मनुष्य-जनम यह, जीत भावै हार अब । “सुन्दर” कहत यामें जूझाको सो खेज है ॥२॥

जिनको तू अपने सनेही-मित्र और खो-पुत्र, माता-पिता भाई-बहन आदि सम्प्रभुता है, वे तेरे घरमें तेरे ही दुश्मन हैं । वास्तवमें, वे सब तेरे शत्रु हैं ; पर मोहके कारण तुझे वे मित्र