भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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लेकर रामचन्द्र बनोगे। भगवान् को तत्काल रामरूप धर, धनुषवाण हाथमें लेना पड़ा। यह काम भगवान् को भक्तकी दृढ़ता देख कर करना पड़ा।

प्रीति पथेहियेकी सच्ची और आदर्श है। वह चाहे प्यासा मर जाय, पर मेवके सिवा किसी भी जलाशयका जल नहीं पीता। "उत्तर वातकाष्टक" में लिखा है :—

पयोद हे ! वारि ददासि वा न वा ।

त्वदेकचित्तः पुनरेष चातकः ॥

वरं महत्या श्रियते पिपासया

तथापि नान्यस्य कोरात्युपासनाम् ॥

हे मेघ ! तू जल दे चाहे न दे, चातक तो तेरा ही आश्रय रखता है। वोर प्याससे मर भले ही जाय, पर वह दूसरेको उपासना नहीं करता। गोस्वामि तुलसीदासजीने भी कहा है :—

चातक धन तजि दूसरे, जियत न नाई नारि ।

मरत न मैंगे अर्धजल, सुरसरिहु को वारि ॥

व्याधा वधो पपीहरा, पुरो गंगजल जाय ।

चौंच गूँदि पीवे नहीं, धिक पीवन प्रण जाय ॥

चातकने मेघको छोड़ और किसीको अपनी जिन्दगी में स्त्रि न नवाया। मरते समय गंगाका जल भी ग्रहण न किया। किसी शिकारी ने किसी चातकको मारा। वह गंगाजी में गिर