भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 443

( ३३२ )

पड़ा, प्यास के मारे धबरा रहा था, पर गंगा जल नहीं पोता था। उसने उठती बाँच बन्द कर ली ; कि कहीं जल मुखमें न चला जाय और मेरा प्रण दूद जाय। वाह वाह ! प्रीति और भक्ति हो तो ऐसी ही हो।

सारंगश यह है, कि भगवान् के भी जिस नामसे प्रेम हो, उसे छोड़ कर दूसरेसे प्रेम न करना चाहिये। एक ही पतिकी खी होने में भलाई है। जिसके अनेक पति होते हैं, उसका भला नहीं होता। अनेक देवी देवताओं के उपासक वातक से शिक्षा ग्रहण करें। कहा है :—

पतिव्रताको सुख धना, जाके पति है एक।

मन मैली व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥

पतिव्रता पतिकों भजे, और न अन्यसुहाय।

सिंह-बचा जो लंघना, तोभी धास न खाय ॥

“कबिरा” सीप समुद्र की, रटे पियास पियास।

सकल बूँदको ना भिने, स्वाति बूँदकी धास ॥

प्रीति रीति तुम्ह सो मेरे, बहु गुनियाला कन्त।

जा हंसि बैलूँ और सँ, तो नील रंगाऊँ दन्त ॥

पतिव्रता, जिसके एक पति होता है, सदा सुखी रहती है ; किन्तु अनेक खसमवाली व्यभिचारिणी सदा दुखी रहती है। पतिव्रता सदा अपने पतिको ही चाहती है ; उसे दूसरा अच्छा नहीं लगता। सिंहका बच्चा, लंघन पर लङ्घन करने पर भी,