वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ३३१ )
लेकर रामचन्द्र बनोगे। भगवान् को तत्काल रामरूप धर, धनुषवाण हाथमें लेना पड़ा। यह काम भगवान् को भक्तकी दृढ़ता देख कर करना पड़ा।
प्रीति पथेहियेकी सच्ची और आदर्श है। वह चाहे प्यासा मर जाय, पर मेवके सिवा किसी भी जलाशयका जल नहीं पीता। "उत्तर वातकाष्टक" में लिखा है :—
पयोद हे ! वारि ददासि वा न वा ।
त्वदेकचित्तः पुनरेष चातकः ॥
वरं महत्या श्रियते पिपासया
तथापि नान्यस्य कोरात्युपासनाम् ॥
हे मेघ ! तू जल दे चाहे न दे, चातक तो तेरा ही आश्रय रखता है। वोर प्याससे मर भले ही जाय, पर वह दूसरेको उपासना नहीं करता। गोस्वामि तुलसीदासजीने भी कहा है :—
चातक धन तजि दूसरे, जियत न नाई नारि ।
मरत न मैंगे अर्धजल, सुरसरिहु को वारि ॥
व्याधा वधो पपीहरा, पुरो गंगजल जाय ।
चौंच गूँदि पीवे नहीं, धिक पीवन प्रण जाय ॥
चातकने मेघको छोड़ और किसीको अपनी जिन्दगी में स्त्रि न नवाया। मरते समय गंगाका जल भी ग्रहण न किया। किसी शिकारी ने किसी चातकको मारा। वह गंगाजी में गिर
( ३३२ )
पड़ा, प्यास के मारे धबरा रहा था, पर गंगा जल नहीं पोता था। उसने उठती बाँच बन्द कर ली ; कि कहीं जल मुखमें न चला जाय और मेरा प्रण दूद जाय। वाह वाह ! प्रीति और भक्ति हो तो ऐसी ही हो।
सारंगश यह है, कि भगवान् के भी जिस नामसे प्रेम हो, उसे छोड़ कर दूसरेसे प्रेम न करना चाहिये। एक ही पतिकी खी होने में भलाई है। जिसके अनेक पति होते हैं, उसका भला नहीं होता। अनेक देवी देवताओं के उपासक वातक से शिक्षा ग्रहण करें। कहा है :—
पतिव्रताको सुख धना, जाके पति है एक।
मन मैली व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥
पतिव्रता पतिकों भजे, और न अन्यसुहाय।
सिंह-बचा जो लंघना, तोभी धास न खाय ॥
“कबिरा” सीप समुद्र की, रटे पियास पियास।
सकल बूँदको ना भिने, स्वाति बूँदकी धास ॥
प्रीति रीति तुम्ह सो मेरे, बहु गुनियाला कन्त।
जा हंसि बैलूँ और सँ, तो नील रंगाऊँ दन्त ॥
पतिव्रता, जिसके एक पति होता है, सदा सुखी रहती है ; किन्तु अनेक खसमवाली व्यभिचारिणी सदा दुखी रहती है। पतिव्रता सदा अपने पतिको ही चाहती है ; उसे दूसरा अच्छा नहीं लगता। सिंहका बच्चा, लंघन पर लङ्घन करने पर भी,
इती (२)
एक
गा, के लु त, लु ना
के के
( ३३३ )
घास नहीं खाता । कबीरदास कहते हैं, समुद्रकी सीप प्यास- ही-प्यास रटा करती है ; कितनी ही बूँदें क्यों न गिरे, उसे तो स्वातिकी बूँद ही प्यारी लगती है । मेरे गुणनिधान कन्त ! मेरी प्रीति तुझसे है । जो मैं दूसरेसे हँसकर बोल्छूँ तो मेरा काला सुँद हो ।
दोहा ।
नाहिं शिव अरु विष्णुमें, सूर्य अन्तर मोग । तदिप चन्द्रशेखर लखत, प्रीति अधिक कछु होय ॥६६॥
99. Although I see no difference between Shiva, 'the Lord of the universe, and Vishnu the Omnipresent, but my love flows towards the One who bears the new moon on his forehead, i. e., Shiva.
रे कंदर्प करं कर्दर्थयसि किं कोदण्डकारितैः
रेरे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथाजल्पसि ॥
मुग्धे क्षिप्रविदग्धमुग्धमधुरैलोलेः कटाचैरलं
चेतरनुम्बितचन्द्रचूडचरणभ्यानामृतं वर्त्तते ॥१००॥
हे कामदेव ! तू धनुष्यकार सुतानेके लिये क्यों बारबार हाथ उठाता है ? हे कोकिला ! तू मीठी-मीठी सुहावनी आवाज़में क्यों कुड-कुड करती है ? ऐ मूर्खा स्त्री ! तू अपने मनोमोहक मधुर कटाक्ष मुझपर क्यों चलाती है ? अब तुम मेरा कुछ नहीं कर
( ३२४ )
सकते ; क्योंकि अब मेरे चित्तने शिवके चरण चूमकर अमृत पी लिया है ॥१००॥
जब तब मनुष्यका मन ब्रह्मानन्दका भङ्गा नहीं जानता, जब तक वह परमात्माके चरणोंमें ध्यान लगा कर अमृत नहीं पीता, तभी तक कामदेवका ज़ोर चलता है, तभीतक कोकिला का पञ्चम स्वर उसके दिलमें खलबली पैदा करता है, तभी तक स्त्री के कटाक्ष-वाण उस पर असर करते हैं ; कामारि शिव से प्रीति होने पर ये सब कुछ नहीं कर सकते । भगवान् शिव और कामदेवमें वैर है ; अतः शिवभक्तों पर कामदेव अपने अस्त्र नहीं चला सकता ।
छप्पय ।
अरे काम वेकाम, धनुष टंकारत तर्जत । तू हूँ कोकिल व्यर्थ बोल, काहेको गरजत ॥ तैसे ही तू नारि, वृथा ही करत कटाक्षे । मोहि न उपजे मोह, छोह सब रहिगे पाखै ॥ चित्त चन्द्रचूड़के चरणको, ध्यान अमृत बरषत हिते । आनन्द अखण्डानन्दको, ताहि अमृत सुख क्यों हिते ॥१००॥
100. O Cupid, why dost thou raise thy hand repeatedly to make the sound of thy bow-string audible? O cuckoo, why dost thou prattle in vain uttering forth thy soft and melodious strains? O foolish woman. let alone thy loving and sweet
( ३३५ )
coquetries, as my mind has now drunk the nectar of kissing the feet of Shiva in prayer.
कोपीनं शतखण्डनञ्जरतरं कन्या पुनस्तादृशी
निश्चिन्तं सुखसाध्यैव्ययशनं शय्या रसशाने वने ॥
मिवाभिन् सधानताऽतिदिनला चिन्ताऽथशून्यालये
ध्वस्ता शेषमदममाद मुदितो योगी सुखं तिष्ठति ॥१०१॥
वही योगी सुखी है, जो एकदमसे फटी-पुरानी सैकड़ों चिथड़ोंसे बनी कोपीन पहनता है और वैसी ही गुदड़ी ओढ़ता है, जिसके पास चिन्ता नहीं फटकती, जो सुखसे मिला हुआ भिक्षात्र खाता है, जो रमशान-भूमि या वनमें सो रहता है, जो मित्र और शत्रुओंको समान समझता है, जो सूनी भोंपड़ीमें ध्यान करता है और जिसके मद और प्रमाद सम्पूर्ण रूपसे नष्ट हो गये हैं ॥१०१॥
फटी पुरानी कोपीन पहनने, चिथड़ोंकी गुदड़ी ओढ़ने, निश्चिन्त रहने, सुख से मिले भिक्षात्र के खाने, मरघट या जड़लमें सो रहने, दोस्त और दुश्मन को बराबर समझने और नितान्त सुने घरमें पवित्र ध्यान करनेसे जिसके मद और प्रमाद नाश हो गये हैं, वही योगी संसारमें सुखी है। ऐसे महापुरुषोंको किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं होती। जिसे किसी चीज़की इच्छा नहीं, उसे किसकी गुरुज़? जो मित्र और शत्रु को एक नज़र से देखते हैं, जहाँ जगह पाते हैं वहीं
( ३३६ )
पड़ रहते हैं, जो मिल जाता है वही खा लेते हैं, उन्हें न चिन्ता-राक्षसी सताती है, न उन्हें घमण्ड होता है और न उन्हें मस्ती आती है। वे तो ब्रह्म के ध्यान में मग्न रहते हैं, इसलिये दुःख उनके पास नहीं आता ; वे सदा सुखमें दिन बिताते हैं। जो लोग बहि्या-बहि्या कपड़े पहनते हैं, शाल-दुशाले ओढ़ते हैं, अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट भोजन करते हैं, मखमली गद्दे तकियों पर सोते हैं, किसीको दोस्त और किसीको दुश्मन समझते हैं, ब्रह्मका ध्यान नहीं करते उनको चिन्ता लगी ही रहती है। देखनेमें वे सुखी मालूम होते हैं, पर भीतर-ही-भीतर उनकी आत्मा जला करती है। चिन्ता उनको खोखला कर डालती है। क्योंकि बहि्या-बहि्या भोजन और वस्त्रोंके लिये उन्हें सदा उपाय करने पड़ते हैं, और उनकी रक्षाकी चिन्ता करनी पड़ती है। ऐसोंके ही मित्र और शत्रु होते हैं। जिनका वे भला करते हैं, जिन्हें कुछ सहायता देते हैं अथवा जिन्हें उनसे कुछ मिलने की आशा रहती है, वे मित्र बन जाते हैं ; पर जिनका स्वार्थ साधन नहीं होता, जो उनके ठाठ बाठ और वैभवको फूटी आँखसे नहीं देख सकते, वे उनके नाशकी चेष्टा करते और उनके दुश्मन हो जाते हैं। इसलिये उन्हें रात-दिन शत्रुओंसे बदला लेने और उन्हें पराजित करनेकी फिकके मारे क्षण-भर भी सुखको नींद नहीं आती। अपने वैभव और ऐश्वर्य्यको देखकर उन्हें स्वतः ही अभिमान हो आता है। अभिमानके नशेमें वे अनर्थ करने लगते हैं ; इससे उन्हें सदा भयभीत
( ३३७ )
रहना पड़ता है। बहुत क्या कहें; जिनको आप अमीर देखते हैं, जिनको आप स्त्री-पुत्र धन-रत्न गाड़ी-बोड़े मोटर प्रभृतिसे सुखी देखते हैं, वे वास्तवमें जरा भी सुखी नहीं। सुखी वही है, जिसे किसी चीज़की ज़रूरत नहीं, जिसे किसीसे वर या प्राप्ति नहीं, जिसे ज़रा भी अभिमान नहीं, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जो कभी चिन्ताको पास नहीं आने देता और जो ब्रह्मानन्दमें ही मग्न रहता है। भला राजा महाराजा और धनी लोग इस सुखको कैसे पा सकते हैं? अगर सुखी होना चाहो, तो संसारको त्याग कर, एकदमसे निश्चिन्त होकर, परमात्माके सिवा किसी भी चीज़की चिन्ता न करो।
जो लोग संसार त्यागें, वह सच्चे मनसे त्यागें; दौग करनेसे कोई लाभ नहीं। आजकल ऐसे बनावटी महात्मा बहुत देखनेमें आते हैं, जो जटा-जूट बढ़ा लेते हैं, स्नाक रमा लेते हैं, आँखें लाल कर लेते हैं, गंगामें पहरों बड़े रहते हैं, शूलोंकी शय्या पर सोते हैं, पर उनकी आशा और तृष्णा नहीं जाती। वे ज़ाहिरा कुछ उठाते हैं, कर्मन्त्रियोंसे उनका काम नहीं लेते; पर मन और ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें नहीं करते, वासनाओंका त्याग नहीं करते, इससे उनका जीवन बुरा जाता है। ऐसे लोगोंके सम्बन्धमें महात्मा कबीर कहते हैं:—
निरवन्धन बंधा रहे, बंध्या निरवन्ध होय । कर्म करे करता नहीं, दास कहाने सोय ॥
२२
इती (२)
एक
( ३२८ )
कृष्ण भगवान् गीताके तीसरे अध्यायके छठे श्लोकमें कहते हैं :—
कर्मैन्द्रियाणि संयम्य य ब्राह्मते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
जो मनुष्य कर्मैन्द्रियोंको वशमें करके कुछ काम तो नहीं करता ; किन्तु मनमें इन्द्रियोंके विषयोंका ध्यान किया करता है, वह मनुष्य मूढ़ा और पाखण्डी है ।
मतलब यह है, कि मनुष्यको हाथ, पाँव, मुँह, गुदा और लिङ्गको वशमें कर लेने और इनसे कोई काम न लेनेसे कोई लाभ नहीं ; इनसे तो इनका काम लेना ही चाहिये ; किन्तु आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचाको वशमें करना चाहिये । आँख कान आदि पाँचों ज्ञान-इन्द्रियोंको वशमें करना या अपने-अपने विषयोंसे रोकना ज़रूरी है । बहुतसे लोग, जाहिरमें सिद्ध बननेके लिये, हाथ पाँव प्रभृति कर्मैन्द्रियोंसे काम नहीं लेते, किन्तु मनमें भाँति-भाँतिके इन्द्रिय-विषयोंको इच्छा किया करते हैं । भगवान् कृष्ण ऐसोंको पाखण्डी कहते हैं ।
सबसे अच्छा और सिद्ध पुरुष वही है, जो जाहिरा तो काम करता है, किन्तु अन्दरसे मन और ज्ञानैन्द्रियोंको विषय-वासनासे रोकता है । गीतामें कहा है :—
यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मैन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥
( ३३६ )
हे अर्जुन ! जो मनसे आँख कान नाक आदि इन्द्रियों को वशमें करके और इन्द्रियोंके विषयोंमें मन न लगा कर “कर्म-योग” करता है,—वही श्रेष्ठ है ।
रहीमने यही बात कैसी अच्छी तरह कही है :—
जा “रहीम” मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं ।
जलमें छाया जा परी, काया भीजत नाहिं ॥
तनको योगी सब करें, मनको विरला कैय ।
सहजे सब सिधि पाइये, जा मन योगी होय ॥
मतलब यह है, कि दौंग करनेसे कोई लाभ नहीं । जिनका दिल साफ है, जिनके दिलसे वासनायें निकल गई हैं, उन्हें नहाने धोने प्रभृति विबाध कामों या दूकानदारीकी ज़रूरत नहीं है । रहीम कहते हैं, मन यदि हाथमें है तो मनसा कहीं क्यों न जाय, हानि नहीं ; क्योंकि जलमें शरीरकी परछाईं पड़ने से शरीर नहीं भीजता । लोग शरीरको जोगी करते हैं,—तिलक छापे लगाते हैं, जटाजूट बढ़ाते हैं, नेत्रोंको सुखें करते हैं, भभूत मलते हैं, कोपीन बाँधते हैं ; पर मनको कोई विरलाही जोगी करता है । लोग ऊपरसे योगी बन जाते हैं, पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है । शरीरसे चाहे जो काम क्यों न किये जायें, पर मनमें विषयोंकी कामना न रहे ; यानी शरीर जोगी न हो, मन जोगी हो जाय ; तो सिद्धि या मोक्ष मिलनेमें सन्देह नहीं । सारांश यह कि, मनके योगी होनेसे ही ईश्वर मिलता है ।
( ३४० )
महाकवि जौक कहते हैं :—
सरापा पाक हैं धोये जिन्होंने हाथ दुनियासे ।
नहीं हाजत कि वह पानी बहयें सरसे पाऊँ तक ॥
जिन्होंने दुनियासे हाथ धो लिये हैं, वे सिरसे पाँव तक शुद्ध हो गये हैं। उन्हें सिरसे पाँव तक पानी बहाकर ज्ञान करनेकी जरूरत नहीं।
मन जब वासना-हीन हो जाता है, तब वह सूखी दिया-सलाईके समान हो जाता है। सूखी दियासलाई जिस तरह भट जल उठती है, पर गीली नहीं जलती; उसी तरह वासना-हीन मन पर परमात्माका रङ्ग जल्दी चढ़ता है; किन्तु वासना-युक्त मन पर हरगिज़ नहीं। इसलिये मनको वासना-हीन करना चाहिये। साथ ही भक्ति भी निष्कास करनी चाहिये। ईश्वरसे मुसाद न माँगनी चाहिये। कामना रख कर भक्ति करनेसे कामना निश्चय ही पूर्ण होती है—ईश्वर भक्तकी इच्छा अवश्य पूरी करता है; पर वैसी भक्तिये परिणाममें भय है; क्योंकि फलोंके भोगनेके लिये जन्मना और मरना पड़ता है। किन्तु जो लोग बिना किसी इच्छाके परमात्माकी भक्ति करते हैं, वे मुक्ति लाभ करते हैं—उन्हें जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता।
जब साधकके मनमें कुछ कामना नहीं रहती, तब उसके मनसे ईर्षा-द्वेष और मित्रता-शत्रुता सब दूर हो जाती हैं। वह
( ३४१ )
सब जगत्को एक नज़रसे देखता है। वह मनुष्योंकी आशा नहीं रखता, केवल परमात्माको शरण ले लेता है; इसलिये उसे सहजमें मुक्ति मिल जाती है। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है :—
तव लागि हमते सब बड़े, जब लागि है कुछ चाह ।
चाह-रहित कहको अधिक, पाय परमपद थाह ॥
जब तक मनमें इरा भी आशा रहती है, तभीतक मनुष्य किसीको बड़ा मानता है और किसीका दास बनता है; जब आशा नहीं रहती, तब वह सबको स्वप्न समझता है और सबका आसरा छोड़ एक मात्र परमात्माका आसरा पकड़ता है; इससे उसको, भववन्धनसे छुटकारा मिलकर, परम पदकी प्राप्ति हो जाती है।
क्षपय ।
कथा अरु कोपीन, फटी पुनि महा पुरानी ।
बिना याचना भीख, नींद मरघट मनमानी ॥
रह जग सों निश्चित, फिर जितही मन आवै ।
राखे चितकूँ शान्त, अनुचित नहि भावै ॥
जो रहें लीन यस ब्रह्ममें, सोवत अरु जागत यदा ।
है राज तुच्छ तिहुँ भुवनको, ऐसे पुरुषन कों तदा ॥१०१॥
101. Happy is the recluse who wears a totally worn out loin-cloth, torn into a hundred pieces as well as a covering
( ३४२ )
sheet in the same tattered condition, who is free from cares and eats food easily got by begging, who sleeps in a cremation-ground or a forest, who is indifferent to friends as well as to foes, who sits in contemplation in a lonely cottage and whose vanity and passions have been totally destroyed,
भोगा भंगुरवृत्तयो बहुविधास्तैरेव चायं भव-
स्तत्कस्यैव कृते परिश्रमतरे लोका कृतं चेष्टितैः ॥
आशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां
कायोच्छितिवशे स्वधामनि यदि श्रद्धेयसम्पद्भूचः ॥१०२॥
नाना प्रकारके विषय-भोग नाशमान और संसार-बन्धनके कारण हैं, इस बातको जान कर भी मनुष्यो ! उनके चक्रमें क्यों पड़ते हो ? इस चेष्टासे क्या लाभ होगा ? अगर आपको हमारी बातका विश्वास हो, तो आप अनेक प्रकारके आशा-जालके टूटनेसे मुद्ध हुए चित्तको सदा कामनाशक स्वयंप्रकाश शिवजीके चरणोंमें लगाओ। ( अथवा अपनी इच्छाओंके समूल नाश करनेके लिए, अपने ही आत्माके ध्यानमें मग्न हो जाओ ) ॥१०२॥
आप आज जिन विषय-सुखोंको देखकर फूँले नहीं समाते, वे विषय-सुख सदा आपके साथ नहीं रहेंगे। वे आज हैं, तो कल नहीं रहेंगे। वे बिजलीकी चमकके समान चञ्चल हैं, अभी बिजली चमकी और फिर नहीं। आप ऐसे नश्वर, असार, क्षणस्थायी सुखों पर मत भूलो। होश करो ! आपकी काया
( ३४३ )
नाशमान् है। आप सदा इस संसारमें नहीं रहेंगे। आपकी जिन्दगीका कोई भरोसा नहीं। आपका जो दम आता है, उसे ही गनीमत समझिये। आप एक क्रुद्ध रखकर, दूसरा क्रुद्ध रखनेकी भी दृढ़ आशा न कीजिये। आपका जीवन हवाके भोंकोंसे छिन्न-भिन्न मेघोंके समान है। अभी घटा छा रही थीं; देखते-देखते हवा उन्हें कहाँ-का कहाँ उड़ा ले गई; आकाश साफ हो गया। यह सारा संसार, संसारके सुख-भोग और स्त्री-पुत्र धन-रत्नादि सभी स्वप्नकी सी माया है। यह दुनिया मुसाफिरखाना है। रोज़ अनेक आदमी मुसाफिरखाने, सराय या धर्मशालाओंमें आते और जाते हैं; सदा उनमें कोई नहीं रहता। वे जिस तरह एक दिन या दो तीन दिन ठहर कर चले जाते हैं; उसी तरह आपको भी, इस दुनिया-रूपी सरायमें चन्द रोज़ क़याम करके, आगे जाने होगा। ये सारे सामान यहाँ के यहीं रह जायेंगे। ये सब पैसे हो रहेंगे, पर आप न रहेंगे। इसलिये आप होशियार रहिये, भूलिये मत। आप आज जिस जवानी पर इतने इतराते और इतने श्रद्धार-बनाव करते हैं, यह भी चन्दरोज़ा है। यह चार दिनकी चाँदनी है। इसके बाद अँधेरी रात निश्चयही आवेगी; अर्थात् इसके बाद बुढ़ापा अवश्य आवेगा। उस समय आपको यह अकड़, यह उल्लू-कुद, यह पेटना, यह सूठे मरोड़ना—सब हवा हो जायगा। आप शीघ्र ही लाठी टेक कर चलने लगेगे। आपका रूप-लावण्य नाश हो जायगा। जो लोग आपको खूबसूरत समझकर आज
इती (२)
एक
ता, के
कि
( ३४४ )
द्वार करते हैं, वे ही कल आपको देखकर नाक भौं सिकोड़ेगे। फिर भला, आप ऐसी नश्वर निकम्मी काया पर क्यों इतना अभिमान करते हैं? आप अहङ्कारको त्यागिये और अपने लिये उस खिलाड़ीका एक मिट्टीका पुतला-मात्र समझिये। सबकी शुभ कामना और परोपकार कीजिये, और एकमात्र अपने बानेवालेसे ही दिल लगाइये। इसीमें आपका कल्याण है। यह जगत् कुछ भी नहीं, कोरा भ्रम है। यह मृगमरीचिका या स्रम कीसी माया है। इस पर ज्ञानी नहीं भूलते। महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :—
कोऊ रुप फूलन की सेज पर सुतो आइ । जब लग जाग्योतौ लों, अति सुख मान्यो है ॥ नींद जब आई, तब वाही कैं स्वपन भयो । जब प्रयो नरकके कुण्डमें, चूँ जान्यो है ॥ अति दुःख पावे, पर निकस्यो न कयूँ ही जाहि । जागि जब प्रयो, तब स्वपन बखान्यो है ॥ यह झूठ वह झूठ, जाग्रत स्वपन दोऊ । “सुन्दर” कहत, ज्ञानी सब भ्रम मान्यो है ॥
व्यपय ।
अति चंचल ये भोग, जगतहूँ चंचल तैसों । तू क्यों भटकत मूढ़ जीव, संसारी जैसों ॥
( ३४५ )
आशाफ़ाँसी काट, चिच्च तू निर्मल हवैरे ।
साधन साधि समाधि, परम निज पदको हवैरे ॥
करि रे प्रतीति मेरे बचन, डुरिरे तू इह ओरको ।
छित यहै यहै दिनहूँ भल्यो, निज राखै कछु भोरको ॥१०२॥
102. The various kinds of sensual pleasures are liable to destruction. They are the causes of worldly bondage, what for, O men, then do you wander about so busily? If you trust upon my word, then it is better for you to fix your mind, made pure by the calming down of the hundredfold network of hopes, in contemplation within your own Self for the extermination of your desires.
धन्यानां गिरिकन्दरे निवसतां ज्योतिः परं ध्यायता-
मानन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशंकमङ्केशयाः ॥
ब्रह्माकं तु मनोरथोपरचितभासादवापीत-
क्रीडांकाननकैलिकौतुकजुषामायुः परिचीयते ॥१०३॥
वे धन्य हैं, जो पर्वतोंकी-गुफाओंमें रहते हैं और परमब्रह्मकी ज्योतिका ध्यान करते हैं, जिनके आनन्दाश्रुओंको उनकी गोदमें बैठे हुए पत्नी निर्भयतासे पीते हैं । हमारी जिन्दगी तो मनोरथोंके महलकी नावड़ीके किनारेके क्रीडा-स्थानमें लीलायें करते हुए ही बुथा बीतती है ॥१०३॥
मतलब यह, कि वे लोग सफल-काम हैं, जो पहाड़ोंकी गुफाओंमें बैठे हुए परमात्माका ज्योतिका ध्यान करते रहते
( ३४६ )
हैं और उस ध्यानमें इतने मग्न हो जाते हैं, कि उन्हें अपने तनोबदनकी भी सुख नहीं रहती। उनको भीतर-ही-भीतर उस ब्रह्मके ध्यानसे जो आनन्द बोध होता है, उससे उनकी आँखोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। पक्षी उनकी गोद में निडर बैठे हुए उन आँसुओंको पीते हैं। उन्हें कुछ खबर नहीं, कि पक्षी गोदमें बैठे हैं या क्या कर रहे हैं। वे तो आनन्दमें बेसुख रहते हैं। यही आनन्द परमानन्द है; इससे परे और आनन्द नहीं। जिनको यह सच्चा आनन्द मिलता है, वही सच्चे भाग्यवान हैं। एक वह है और एक हम अभागे हैं, जो रात-दिन मनोरथांके महल गढ़ा करते हैं—रात-दिन मिथ्या कल्पनायें किया करते हैं। इन शोखबिल्लीके से गढ़न्तोंसे हमें कोई लाभ नहीं—इन भूटे खयाली बुलावोंके पकानेमें हमारा दुष्प्राप्य जीवन वृथा नष्ट होता है !
जो मनुष्य मानव-चोला पाकर परमात्माका भजन नहीं करते, परमात्माके दर्शनोंकी खेष्टा नहीं करते—उनका जीवन वृथा है। इसलिये उस्ताद ज़ौकने कहा है :—
दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमनाये विसाल ।
चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीदकी हसरत नहीं ॥
वह दिल ही नहीं, जिसे तेरे पानेकी इच्छा न हो और वह आँख ही नहीं, जिसे तेरे दर्शनकी लालसा न हो ।
( ३४७ )
बीती सो बीती, अब तो होश करो !
भाइयो ! बीतीसो बीती, अब तो चेत करो और प्रभुसे लौ लगाओ । आज-कल मत करो, नहीं तो पछताओगे । अन्त समय पछतानेसे कोई लाभ न होगा । जो लोग विचार ही विचार करते रहते हैं, वे धोखेमें रह जाते हैं और काल एक दिन अबानक आकर उनकी चोटी पकड़ लेता है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं :—
गये पलट आवें नहीं, सो कर मन पहचान ।
ब्राजु जोई सोई कालुहि है, तुलसी भर्म न मान ॥
रामनाम रटिबो भलो, तुलसी ख़ता न खाय ।
लरिकाईं तैं पैरिबो, धोखे बूढ़ि न जाय ॥
नदीकी जो धार चली गई है, लौटकर नहीं आयेगी । जो दिन चले गये हैं, वापस नहीं आयेंगे । जो दिन आज हैं, वही कल है । कल कोई नई बात नहीं हो जायगी । अतः जो कल करना है, उसे आजही करो ; और जो आज करना है, उसे अभी करो ; क्योंकि यदि पल भरमें प्रलय हो गई—आप चले बसे, तो फिर कब करोगे ? वचपनसे ही राम नाम रटना अच्छा है । जो लोग वचपनसे ही तेरन्ध सीख लेते हैं, धोखेसे नहीं डूबते । जो लोग यही विचार किया करते हैं, कि अमुक काम
इती (२)
एक
ता, के रन्तु तत, रन्तु रना
कि के
( ३४८ )
हो जायगा, तो उसके बाद हम सब गृहस्थीके भगड़े छोड़ भगवत् भजन करेंगे, वे इस तरहके विचार किया ही करते हैं कि, इतने में उनका समय पूरा हो जाता है और काल उनका चोटा पकड़ कर उन्हें लेजाता है। उस वक्त वह बहुत पछताते और सिर धुनते हैं, लेकिन उस समय हो क्या सकता है ? उस समय उनकी गति उस भौरैकी सी होती है, जो कमलके मुखमें बन्द होकर कहता है :—
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ।
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजालम् ॥
इत्थं विचिन्तयति कोशागते द्विषेपे ।
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार ॥
बड़े-बड़े शालके लहड़ोंको छेद डालनेकी शक्ति रखनेवाला भौरा, प्रेमके सारे, कोमल कमलमें बन्द हो जाता है। रात हो जाती है और भौरा कमलके भीतर बैठा हुआ विचार करता है :—“अब रातका अवसान होगा, सवेरा होगा, सूरज उदय होगा और यह कमल खिल जायगा ; तब मैं निकल जाऊँगा। अब रात-भर यहीं आनन्द करूँ।” वह तो ऐसे विचार करता ही रहता है, कि जड़ूली हाथी कमलको उखाड़कर मुँहमें रख लेता है और भौरैके मन-की-मनमें ही रह जाती है। यही वंशा संसारी विषय-लोलुपों की है ! वह विचार बांधा ही करते हैं और काल उन्हें मुँहमें धर लेता है। अतः हो सके
वैराग्यशतक ~~~~~
इती (२) ॥
एक
ता, न के
भौरा कमल में बँटा हुआ अनेक तरह के विचार करता है, हतने में हाथी आकर भौरा समेत कमल को खाजाता है। यही दशा हमारी है। हम रात-दिन विषय-भोगों में लगे रहते हैं और मृत्यु अचानक आकर हमें लील जाती है।
(पृष्ठ ३६६)