भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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महेश्वरे वा जगतायधीश्वरे जनार्दने वा जगदन्तरात्मनि ।

तयोर्न भेदयतिपरितिरस्ति ये तथापि शक्तिस्तत्त्वोन्दुशेखरे ॥६६॥

यद्यपि मुक्ते विश्वेश्वर शिव और सर्वात्मन विष्णुमें कोई भेद नहीं दीखता ; तथापि मेरा मन उन्होंनेकी और सुकता है, जिनके मस्तकमें तरुण चन्द्रमा विराजमान है ; अर्थात् मैं शिवको ही चाहता हूँ ॥६६॥

विष्णु और शिवमें कोई भेद नहीं, एक ही परमात्माके अलग-अलग नाम हैं, वही कृष्ण हैं, वही रघुनाथ हैं, वही राम हैं और वही शिव हैं। पर फिर भी ; जिस नाम का आश्रय ले लिया उसीका भरोसा करना ठीक है। मन भटकाना अच्छा नहीं।

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी ब्रह्मावन गये। वहाँ उन्हें भगवान् कृष्णके दर्शन हुए। भगवान्की बाँको भाँकी देखकर गोस्वामी जी मुग्ध हो गये, पर उन्होंने उनको खिर न नवाया ; क्योंकि उनके इष्टदेव रामचन्द्र जी थे। उन्होंने उस समय कहा :—

“कहा कहूँ छवि आजकी, भले बने हो नाथ ।

तुलसी मस्तक जब नवै, धनुषवाण लेब्रो हाथ ॥”

आपकी छवि आज बहुत ही मनोमुग्धकर है, पर मैं तो आप को तभी प्रणाम करूँगा, जब आप धनुषवाण हाथ में