वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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हे प्यारी सखी बुद्धि ! कुम्हार जिस तरह गीली मिट्टीके लौदों को चाकपर चढ़ाकर डंडेसे चाकको बारम्बार घुमाता है और उससे इच्छानुसार वर्तन तैयार करता है ; उसी तरह संसारको गढ़नेवाला ब्रह्मा हमारे चित्तको चिन्ताके चाकपर चढ़ाकर, विपत्तियोंके डगडेसे चाकको लगातार घुमाता हुआ, हमारा क्या करना चाहता है, यह हमारी समझमें नहीं आता ! ॥६८॥
मनुष्य के पीछे भगवान् ने चिन्ता बुरी लगा दी है। बात यह है, कि मनुष्यके पूर्व जन्मके कर्मोंके कारण या इस जन्म की भूलोंके कारण, उसे विपत्तियाँ भोगनी ही पड़ती हैं। विपत्तियोंसे पार होनेके लिये, मनुष्य रात-दिन चिन्तित रहता है। चिन्ता या फिकसे मनुष्यका रूप-रङ्ग आदि सब नष्ट होकर शीघ्र ही बुढ़ापा आ जाता है। आज-कल ४० बरसकी उम्र में हो लोग बूढ़े हो जाते हैं, इसका कारण चिन्ता ही है। अगर चिन्ता न होती, तो मनुष्यको कुछ दुःख न होता। जहाँतक हो, मनुष्यको चिन्ताको पास न आने देना चाहिये ; क्योंकि चिन्ता चितासे भी डुरी है। चिता मरे हुए को भस्म करती है, पर चिन्ता जीते हुए को ही जलाकर खाक कर देती है ; अतः चिन्तासे दूर रहो। खी पुत्र और धन की चिन्ता में अपनी अमूल्य दुर्लभ कायाको नाश न करो ; क्योंकि ये खी पुत्र प्रभुति तुम्हारे कोई नहीं। अगर चिन्ता और विचार ही करना है, तो इस बातका करो कि, तुम कौन हो और