भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३२८ )

कहाँसे आये हो? स्वामी शङ्कराचार्यने “मोहमुद्गर” में कहा है:—

का तव कान्ता: ? कस्ते पुत्र: ?

संसारोऽयमतीव विचित्र: ।

कस्य त्वं वा ? कुत आयात:

तत्त्वं चिन्तय तदिदं भ्रात: ॥

कौन तेरी स्त्री है? कौन तेरा पुत्र है! यह संसार अतीव विचित्र है। तु कौन है? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व की चिन्ता कर; अर्थात् न कोई तेरी स्त्री है और न कोई तेरा पुत्र है, तथा चिन्ता क्यों करता है?

तु कौन है? कहाँ से आया है? क्यों आया है? तूने अपना कर्त्तव्य पालन किया है या नहीं? तेरा अन्तिम परिणाम क्या है? इत्यादि विचारों द्वारा अपने स्वरूपको पहचान जाने अथवा ईश्वरकी शरण में चले जानेसे ही चिन्ता से पीड़ा छूटेगा और शान्ति मिलेगी। निश्चय ही, चिन्ता और विपत्तियोंसे बचने के लिये, भगवान्का आश्रय लेना सर्वोपरि उपाय है। विपत्ति रूपी समुद्रमें डूबते हुए के लिए भगवान्का नाम ही सच्चा सहारा है। गोस्वामि तुलसीदासजीने कहा है:—

तुलसी साथी विपत्तिके, विद्या विनय विवेक ।

साहस सुकुल सत्यव्रत, राम भरोसो एक ॥