भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पद्मोत्तम कामाग्नि सुदृढतरमारिलव्यति वर्ध प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥६२॥

जब मनुष्यका कष्ट प्यास से सूखने लगता है, तब वह शीतल जल पीता है ; जब उसे भूख लगती है, तब वह साग और कढ़ी प्रभृतिके साथ चोंवल खाता है ; जब उसकी कामाग्नि तेज होती है, तब वह स्त्री को जोर से गले लगाता है ; विचार कर देखनेसे मालूम होता है, कि ये सब बीमारियोंकी एक-एक दवा हैं ; परन्तु लोग इन्हें भूलसे सुखके समान मानते हैं ! ॥६२॥

प्यास रोगकी दवा शीतल जल है ; यानी शीतल जलसे तृष्णा नाश होती है । क्षुधा रोगकी दवा रोटी-भात और साम-दाल प्रभृति हैं ; यानी भात-दाल प्रभृतिसे भूख-रोग नाश होता है । कामाग्नि भी एक रोग है, उसके शान्त करनेका उपाय स्त्रीको छातीसे लगावा है, यानी स्त्रीका आलिकून करने या चिपटानेसे कामकी आग ठण्डी हो जाती है । ( दाह-उत्तरमें पोटुशी कामिनीके शरीरमें चन्दन लगाकर चिपटानेसे बहुत लाभ होता है । ) इन बातोंपर विचार करनेसे साफ मालूम होता है, कि शीतल जल-पान, मिष्ठ मिष्ठ प्रकारके भोजन और स्त्रियोंका आलिकून प्रभृति तृष्णा, क्षुधा और कामाग्नि प्रभृति रोगोंकी औषधियाँ हैं । इनको सुख समझना भूल नहीं तो क्या है ?

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