वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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मनुष्यको गरदन हिलमे लगती है, खाल लटकने लगती है, कमर झुक जाता है, बाल खफेद हो जाते हैं, तोभी स्त्रीके साथ भोग करता है । मुँहके दाँत उखड़ जाते हैं, फिर भी कामी मनके नज़रे नहीं जाते, देह काँपती है; पर खीसे प्रीति रखता है और रात-दिन धनका जाप करता है । अन्तमें घर छोड़ता है, पर नमकहराम मालिकका भजन नहीं करता ।
लप्य ।
मनके मनहीं माँहि, मनोरथ वृद्ध भये सब । निज अंगनमें नाश भयो, वह यौवनहू अब । विद्या है गई बाँफ, बूझवारे नहीं दीसत । दौर्यों आवत काल, कोपकर दशनन पीसत । कवहूँ नहीं पूजे प्रीति सों, चक्रपाणि प्रभुके चरण । भवबन्धन काटे कौन अब, अजहूँ गहुरे हरि शरण ॥११॥
91. All our desires have been stifled within us. Our youth has been changed into old age. All our good qualities have resulted in fruitlessness through the absence of those who would appreciate them. The all-powerful Death, the destroyer of everything, is fast approaching. Now we have realised that there is no shelter for us, save that of the feet of Shiva, the enemy of Cupid.
तृषा शुष्यत्यास्ये पिवित् सलिलं स्वादु सुरभि जुषार्तः सञ्शालीन्कवलयति शाकादिवलितान् ।