भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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भोह छोड़, एकांतमें जा, परमात्माका भजन करना चाहिये ; क्योंकि बुढ़ापेमें कुछ नहीं हो सकता। शैल सादीने कहा है और ठीक कहा है:—

जवान गोशानशी, शेर मदें राहे खुदास्त ।

कि पीर खुद न तवानद, जे गोशये बरखास्त ॥

जवानोंमें जिन्होंने एकांतमें ईश्वर भजन किया है, सच्चे भक्त वेही हैं। बूढ़ा आदमी यदि एकांतवास पर गर्व करे तो भूटा है, क्योंकि वह तो जहाँ पड़ा है, वहाँसे सरक ही नहीं सकता ।

जो लोग सारी उग्र संसारी जंजालोंमें बिता देते हैं और परमात्माका भजन नहीं करते, उनका नक्शा स्वामी सुन्दर दासजीने खूब ही अच्छा खींचा है:—

धीव खचा कटि है लटकी ।

कचहूँ पलटे अजहूँ रतिबामी ॥

दन्त गये मुख के उखरे ।

नखरे न गये सुखो खर कामी ।

कम्पत देह सनेह सु दम्पति ।

सम्पति जंपत है निशि जामी ॥

सुन्दर अन्तहु मौन तज्यो ।

न भज्यो भगवन्त सु लौनहरामी ॥

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