भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बनाने की चेष्टा करना, आग लग जाने पर कुआँ खोदने वाले के समान मूर्खतापूर्ण काम होगा। अतः जो करना है, मरने के समयसे पहले ही करो। किसीने परलोक-साधनके लिये क्या अच्छी सलाह दी है :—

वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वदुष्टीयतां तेनैश्वर्यपिधीयतामपचितः कामे यतिसत्यज्यताम् ; पापीषः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयताम् ॥ आत्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात् तूर्थां विनिर्गम्यताम् ॥

नित्य वेद पढ़ो और वेदोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करो। वेद-विधिसे परमेश्वरकी पूजा करो। विषय-भोगोंको बुद्धिसे हटाओ ; यानी विषयोंको त्यागो। पाप-समूहका निवारण करो। संसारी सुख इन्-फुलेल-बन्दनादिके लगाने, ह्री-भोगने और नाच-गाना देखने-सुनने प्रभृतिका परिणाम विचारो ; यानी इनके दोषोंकी भावना करो। परमेश्वर या आत्मामें अनुराग करो और गृहस्थोंके अनेक दोषोंको समझ कर, शीघ्र ही घरको त्याग कर वनको चले जाओ।

उत्ताद् जौक कहते हैं—

• बेनिशों पहले फनासे हो, जो हो तुम्हको बका। • वनाँ है किसका निशों, जौके फनाने रक्खा ॥

मरनेसे पहले सांसारिक बन्धनोंसे अपने वित्तको हटा