वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २६८ )
बनाने की चेष्टा करना, आग लग जाने पर कुआँ खोदने वाले के समान मूर्खतापूर्ण काम होगा। अतः जो करना है, मरने के समयसे पहले ही करो। किसीने परलोक-साधनके लिये क्या अच्छी सलाह दी है :—
वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वदुष्टीयतां तेनैश्वर्यपिधीयतामपचितः कामे यतिसत्यज्यताम् ; पापीषः परिधूयतां भवसुखे दोषोऽनुसन्धीयताम् ॥ आत्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहात् तूर्थां विनिर्गम्यताम् ॥
नित्य वेद पढ़ो और वेदोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करो। वेद-विधिसे परमेश्वरकी पूजा करो। विषय-भोगोंको बुद्धिसे हटाओ ; यानी विषयोंको त्यागो। पाप-समूहका निवारण करो। संसारी सुख इन्-फुलेल-बन्दनादिके लगाने, ह्री-भोगने और नाच-गाना देखने-सुनने प्रभृतिका परिणाम विचारो ; यानी इनके दोषोंकी भावना करो। परमेश्वर या आत्मामें अनुराग करो और गृहस्थोंके अनेक दोषोंको समझ कर, शीघ्र ही घरको त्याग कर वनको चले जाओ।
उत्ताद् जौक कहते हैं—
• बेनिशों पहले फनासे हो, जो हो तुम्हको बका। • वनाँ है किसका निशों, जौके फनाने रक्खा ॥
मरनेसे पहले सांसारिक बन्धनोंसे अपने वित्तको हटा
( २६६ )
ले—अमर होनेको यही एक तरकीब है ; बर्ना मौत किसीका निशान नहीं छोड़ती ।
छप्पय ।
जों लौं देह निरोग, और जों लौं न जरा तन । अरु जों लौं बलवान् आयु, अरु इन्द्रिनके गन । तौं लौं निज कल्याण करन को, यल विचारत । वह पण्डित वह धीर वीर, जो प्रथम संहारत । फिर होता कहा जजीर भये, जप तप संयम नहि बनत । भव काम उठयौं निज भवन जब, तब क्योंकर कूपहि खनत ॥८८॥
88. As long as the body is in good health and old age is still far off, as long as the faculties of senses are strong and the end of life has not come, a wise man should try his best for his spiritual weal. When the house has caught fire what is the use of attempting to dig a well.
नाभ्यस्ता सुवि वादिश्वन्दमनी विद्या विनीतोचिता
खड्गाग्रैः करिकुम्भीठलनैर्नाकं न नीतं यशः
कान्ताकोमलपल्लवाधररसः पीतो न चन्द्रोदये
तारुण्यं गतमेव निष्फलमहो शून्यालयं दीप्तवत् ॥८९॥
हमने इस जगतमें नम्रोंको सन्तुष्ट करनेवाली और वादियोंका मान भञ्जन करनेवाली विद्या नहीं पढ़ी, तलवारकी धार से हार्थीके मस्तक का पिछला भाग काटकर अपना यश स्वर्ग तक नहीं
( ३०० )
पहुँचाया ; चौदनी रातमें सुन्दरीके कोमल अंधर-पल्लव (निचले होठ) का रस भी नहीं पिया। हाय ! हमारी जवानी सूने घरमें जलने वाले और आपही बुझ जाने वाले दीपककी तरह योंही गयी ॥८६॥
दोहा ।
थिया पढ़ी न रिपु दले, रहौ न नारि समीप ।
योगन यह योंही गयो, ज्यों सूने ग्रह दीप ॥८७॥
89, We did not attain in this world literary knowledge which pleases the meek and puts down the vanity of the crowds of critics, Nor did we extend our fame up to the gates of Swarga by cutting down the backs of elephants' heads with the edge of a sword. Nor did we drink in the moonlight the flowery juice of the soft lower lips of our beloved ones. Alas ! that our youth has passed away uselessly like a burning lamp in an empty house, which spends itself away without being of any use to anybody.
ज्ञानं सतां मानमदादिनाथनं
केषांचिदेतन्मदमानकारणम् ॥
स्थानं विचिक्तं यमिनां विमुक्तये
कामातुराणामतिकामकारणम् ॥८०॥
अच्छे मनुष्योंमें तो ज्ञान उनके मान-मद आदिका नाश करता है ; किन्तु दुष्टोंमें वही ज्ञान मान-मद प्रभृति योगुणोंकी वृद्धि करता है । एकान्त स्थान योगियोंके लिये तो मुक्ति दिलानेवाला
( ३०१ )
होता है ; किन्तु वही कामियों की कामञ्ज्वाला को बढ़ानेवाला होता है ॥६०॥
जिस तरह स्वाति-बूँद सीपमें पड़नेसे मोती और केहेमें कपूर हो जाती है, किन्तु सर्पमुखमें पड़नेसे विषका रूप धारण करती है ; उसी तरह एक हो चीज पुष्प-भेदसे अलग-अलग गुण दिखाती है। ज्ञानसे अच्छे लोगोंका अभिमान नाश हो जाता है, वे सब किसीको अपने बराबर समझते हैं, सबके साथ सहानुभूति रखते हैं, किसीका दिल नहीं दुखाते ; किन्तु उसी ज्ञानसे दुष्ट लोगोंकी दुष्टता और भी बढ़ जाती है, वे अपने सामने जगत्को तुच्छ समझते हैं ; विद्याभिमानके मारे किसीकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखते, अपने सिवा सबको पशु समझते हैं। एक ही ज्ञान दो स्थानोंमें स्थान-भेदसे अपना अलग-अलग प्रभाव दिखाता है। जैसे ; एकान्त स्थान योगियोंके चित्तको ब्रह्मविचारमें लीन करता है और इससे उनको परमपद-मुक्ति-मिल जाती है ; किन्तु वही एकान्त स्थान कामियोंके दिलोंमें मस्ती पैदा करता है।
दोहा ।
ज्ञान घटावै मान मद, ज्ञानहि देय बदाय ।
रहसि मुक्ति पावै यती, कामी रत लपटाय ॥६०॥
90 Knowledge serves the good men as a destroyer of their vanity and false pride. In some, it enhances the same evils.
इती (२)
एक
ग, के नु
( ३०२ )
A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.
जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तागिषु गुणाश्च वध्यफलतां याता गुणवैर्बिना ॥
किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽक्षमी
द्वाहातांस्मरशासनान्त्रिगुणं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥
हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानीके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥
मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनको मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कुछ कर गई; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं।
मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है। इच्छायें पूरा नहीं होतीं और मौन आ जरती है। महाकवि गालिब भी पछता कर कहते हैं :—
हजारों स्वाहिरों ऐसी, कि हर स्वाहिस पै दम निकले। बहुत निकले मेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥
( ३०३ )
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हजारों असीं ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हजारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूर्ण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है। हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया। अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनाहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादल आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह डाकिनि जानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहू न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी समर्थद्वार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर ऐसी ही बातें कही हैं। इस तृष्णाके
( ३०२ )
A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.
जीर्ण एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तंगिषु गुणारच वंध्यफलतां याता गुणैर्बिना ॥ किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽचमी
ब्राह्मातंसंस्मरशासनांध्रियुगलं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥
हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानोंके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है ; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥
मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनकी मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कूँच कर गई ; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं ।
मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है । इच्छायें पूरो नहीं होतीं और मौन आ जाता है । महाकवि गाल्छिब भी पछता कर कहते हैं :—
हजारों स्वप्नहिशें ऐसी, कि हर स्वप्नहिश पै दम निकले । बहुत निकले झेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥
( ३०३ )
महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हज़ारों अर्मी ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हज़ारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है । हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया । अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादत आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह ढाकिन यानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहु न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी सर्मभ्दार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर पेसी हो बाते कही हैं । इस तृष्णाके
( ३०४ )
फेरमें मनुष्यका बुढ़ापा आ जाता है, पर तृष्णा बूढ़ी नहीं होती। बुढ़ापेमें उसका ज़ोर और भी बढ़ जाता है। यह तीनों लोकोंको खाकर और सातों सागरोंको पीकर भी नहीं धापती। इसलिये मनुष्यको आशा-तृष्णा त्यागकर, परमात्मामें लौ लगानी चाहिये। जो नहीं चेतते, उनका परिणाम बुरा होता है। जब एक दमसे बुढ़ापा छा जाता है, शरीर अशक्त हो जाता है, तब कुछ भी नहीं होता। उग्र स्वतम होने या मृत्यु आ जाने पर मनुष्य पछताता हुआ सबको छोड़ चला जाता है। कहा है—
ये मम देश विलायत हैं गज। ये मम मन्दिर ये मम धाती ॥ ये मम मात पिता पुनि बान्धव। ये मम पूत सु ये मम नाती ॥ ये मम कामिनि केलि करे नित। ये मम सेवक हैं दिन राती ॥ सुन्दर ऐसोहि क्वींडि गयेा सब। तेल जरयो सु बुम्भी जब बाती ॥
यह मेरा देश है, ये मेरे हाथी-घोड़े महल-सकान हैं, ये मेरे माँ-बाप और वन्धुबान्धव तथा नाती-पोते हैं, यह मेरी स्त्री और ये मेरे सेवक हैं; ऐसे करता-करता ही मनुष्य सबको छोड़कर चला जाता है। जिस तरह तेलके जल जानेपर दीपक बुझ जाता है; उसी तरह उग्र पूरी होनेपर मनुष्य मर जाता है। अतः ज्वानीमें ही स्त्री-पुत्र प्रभृति सबका
( ३०५ )
भोह छोड़, एकांतमें जा, परमात्माका भजन करना चाहिये ; क्योंकि बुढ़ापेमें कुछ नहीं हो सकता। शैल सादीने कहा है और ठीक कहा है:—
जवान गोशानशी, शेर मदें राहे खुदास्त ।
कि पीर खुद न तवानद, जे गोशये बरखास्त ॥
जवानोंमें जिन्होंने एकांतमें ईश्वर भजन किया है, सच्चे भक्त वेही हैं। बूढ़ा आदमी यदि एकांतवास पर गर्व करे तो भूटा है, क्योंकि वह तो जहाँ पड़ा है, वहाँसे सरक ही नहीं सकता ।
जो लोग सारी उग्र संसारी जंजालोंमें बिता देते हैं और परमात्माका भजन नहीं करते, उनका नक्शा स्वामी सुन्दर दासजीने खूब ही अच्छा खींचा है:—
धीव खचा कटि है लटकी ।
कचहूँ पलटे अजहूँ रतिबामी ॥
दन्त गये मुख के उखरे ।
नखरे न गये सुखो खर कामी ।
कम्पत देह सनेह सु दम्पति ।
सम्पति जंपत है निशि जामी ॥
सुन्दर अन्तहु मौन तज्यो ।
न भज्यो भगवन्त सु लौनहरामी ॥
२०
( ३०६ )
मनुष्यको गरदन हिलमे लगती है, खाल लटकने लगती है, कमर झुक जाता है, बाल खफेद हो जाते हैं, तोभी स्त्रीके साथ भोग करता है । मुँहके दाँत उखड़ जाते हैं, फिर भी कामी मनके नज़रे नहीं जाते, देह काँपती है; पर खीसे प्रीति रखता है और रात-दिन धनका जाप करता है । अन्तमें घर छोड़ता है, पर नमकहराम मालिकका भजन नहीं करता ।
लप्य ।
मनके मनहीं माँहि, मनोरथ वृद्ध भये सब । निज अंगनमें नाश भयो, वह यौवनहू अब । विद्या है गई बाँफ, बूझवारे नहीं दीसत । दौर्यों आवत काल, कोपकर दशनन पीसत । कवहूँ नहीं पूजे प्रीति सों, चक्रपाणि प्रभुके चरण । भवबन्धन काटे कौन अब, अजहूँ गहुरे हरि शरण ॥११॥
91. All our desires have been stifled within us. Our youth has been changed into old age. All our good qualities have resulted in fruitlessness through the absence of those who would appreciate them. The all-powerful Death, the destroyer of everything, is fast approaching. Now we have realised that there is no shelter for us, save that of the feet of Shiva, the enemy of Cupid.
तृषा शुष्यत्यास्ये पिवित् सलिलं स्वादु सुरभि जुषार्तः सञ्शालीन्कवलयति शाकादिवलितान् ।
( ३०७ )
पद्मोत्तम कामाग्नि सुदृढतरमारिलव्यति वर्ध प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥६२॥
जब मनुष्यका कष्ट प्यास से सूखने लगता है, तब वह शीतल जल पीता है ; जब उसे भूख लगती है, तब वह साग और कढ़ी प्रभृतिके साथ चोंवल खाता है ; जब उसकी कामाग्नि तेज होती है, तब वह स्त्री को जोर से गले लगाता है ; विचार कर देखनेसे मालूम होता है, कि ये सब बीमारियोंकी एक-एक दवा हैं ; परन्तु लोग इन्हें भूलसे सुखके समान मानते हैं ! ॥६२॥
प्यास रोगकी दवा शीतल जल है ; यानी शीतल जलसे तृष्णा नाश होती है । क्षुधा रोगकी दवा रोटी-भात और साम-दाल प्रभृति हैं ; यानी भात-दाल प्रभृतिसे भूख-रोग नाश होता है । कामाग्नि भी एक रोग है, उसके शान्त करनेका उपाय स्त्रीको छातीसे लगावा है, यानी स्त्रीका आलिकून करने या चिपटानेसे कामकी आग ठण्डी हो जाती है । ( दाह-उत्तरमें पोटुशी कामिनीके शरीरमें चन्दन लगाकर चिपटानेसे बहुत लाभ होता है । ) इन बातोंपर विचार करनेसे साफ मालूम होता है, कि शीतल जल-पान, मिष्ठ मिष्ठ प्रकारके भोजन और स्त्रियोंका आलिकून प्रभृति तृष्णा, क्षुधा और कामाग्नि प्रभृति रोगोंकी औषधियाँ हैं । इनको सुख समझना भूल नहीं तो क्या है ?
( ३०८ )
क्षपय ।
प्यास लगे जब पान करत, शीतल सुमिष्ट जल । भूख लगे तब खात, भात-श्रुत दूध और फल । बढत कामकी आगि, तबहि नववधू संग रति । ऐसे करत विलास, होत विपरीत दैव गति । सब जीव जगतके दिन भरत, खात पियत भोगहु करत । ये महारोग तीनों प्रबल, बिना मिटाये नहि मिटत ॥६२॥
92. When men's throats are overpowered by thirst, they drink clear and delicious water. When they are stricken with hunger, they eat rice together with curry made of vegetables etc. When the consuming fire of lust is kindled, they embrace closely their wives. Each of these actions is a remedy for a separate malady, but people take delight in them mistaking them for pleasures !
स्नात्वा गांभैः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्चयित्वा विभो
त्वां ध्येये ध्यानं नियोज्य क्षितिश्चरकुहस्रावपर्थकमूले ॥
आत्मारामः फलाशी गुह्यचनरतस्तत्वसादात्मभरारे
दुःखान्मोक्ष्येकदाहं तव चरणस्तो ध्यानमागैर्कनिष्ठः ॥६३॥
हे शिव ! हे कामारि ! गंगा स्नान करके तुफ पर पवित्र फल- फूल चढ़ाता हुआ, तेरी पूजा करता हुआ, पर्वतकी गुफामें शिला पर बैठा हुआ, अपने ही आत्मामें मग्न होता हुआ, वन-फल खाता
( ३०६ )
दुःखा, गुरुकी आज्ञानुसार तेरे ही चरणोंका ध्यान करता हुआ कब मैं इन संसारी दुःखोंसे छुटकारा पाऊँगा ? ॥६३॥
दोहा
नरसेवा तजि, ब्रह्म भजि, गुरुचरण चित लाय ।
कब गंगातट ध्यान घर, पूजोंगो शिव पाय ? ॥६३॥
93. O Shiva, enemy of Cupid, when shall I be saved by Thy grace from the miseries of the world. bathing in the Ganges water, worshipping Thee with purified flowers and fruits, meditating on Thee as my idol, seated on a stone in a mountain cave, content with my own self, eating only wild fruits, obeying the commands of my religious preceptor, devoted to Thy feet and resolved to sit in contemplation as the only path to salvation ?
शय्या शैलशिला गृहं गिरिगुहा वम्भं तरुणां त्वचः
सारंगाः सुहृदो नख चितिरुहां इतिः फलैः कोमलैः ॥
येषां निर्फरम्बुपानसुचितं रत्येव विद्यांगना
मन्ये ते परमेश्वराः शिरसि यैवेद्विना न सेवाञ्जलिः ॥६४॥
मैं उनको परमेश्वर समझता हूँ, जो किसीके सामने मस्तक नहीं नवाते, जो पर्वतकी शिलाको ही अपनी शय्या समझते हैं, जो गुफा को ही अपना घर मानते हैं, जो वृक्षोंकी छालोंको ही अपने वस्त्र और जंगली हिरण्योंको ही अपने मित्र समझते हैं, वृक्षोंके कोमल फलोंसे ही उदरकी अग्रिको शान्त करते हैं, जो
पड़ती (२) ॥
कुच के अथ ना ना
एक
। ता, के रन्तु तत, रन्तु रना
र क क
कि क दे सके
वि क दे (
( ३१० )
कुदरती भरनों का जल पीते हैं और जो विद्याको ही अपनी प्राण-प्यारी समझते हैं ॥६४॥
जो किसी श्वाज्ञकी चाह नहीं रखते, वे किसी की परवा नहीं करते, वे किसीके सामने अस्तक नहीं नवाते ; जिनकी वासनाओंका अन्त नहीं होता, वे ही जने-जनेके सामने सिर झुकाते हैं । जो संसारके दास नहीं, वे सबमुच ही देवता हैं । उस्ताद जीकने कहा है:—
जिस इन्तों को सगे दुनिया न पाया ।
फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥
जो मनुष्य संसारका दास नहीं—संसारका कुत्ता नहीं— वह देवताओंसे कहीं ऊँचा है । देवता उसकी बराबरी नहीं कर सकते । जिसमें सांसारिक वासनाओंका लेश न हो, उस मनुष्य और देवताओंमें कोई भेद नहीं ।
सच्चे महात्मा बन और पर्वतोंको छोड़कर दुनियामें कभी नहीं आते ; वे माँगकर नहीं खाते ; उन्हें वनमें ही जो कुछ मिल जाता है, वही खा लेते हैं ।
महाकवि गालिब कहते हैं:—
वे तलब दें, तो सब उसमें सिवा मिलता है ।
वह गदा, जिसका न हो खूबे सवाल अच्छा है ॥
बिना माँगि मिल जानेमें बड़ा आनन्द है । फकीर वही अच्छा जिसमें माँगनेकी आदत न हो ।
( ३११ )
और भी कहा है:—
दस्ते सवालें, सैकड़ों ऐबोंका ऐब है । जित दस्तमें यह ऐब नहीं, वह दस्ते गँव है ॥
कबीर साहबने भी कहा है:—
अनमीया उतम कहो, मध्यम माँगि जो लेय । कहे कबीर निछछ तो, पर घर धरना देय ॥ उत्तम भीख जो अजगरी, सुनि लीजो निज वैन । कहे कबीर ताके गहे, महा परम सुख चैन ॥
महापुरुष भगवान् के भरोसे रहते हैं, इसलिये उन्हें उनकी झरतकी चीज़ उनके स्नानपर ही मिल जाती हैं। वे संसार कृपी काजलकी कोठरीमें आकर कालिख लगाना पसन्द नहीं करते। संसारी लोगोंके साथ मिलने-जुलनेमें भलाई नहीं। संसारसे दूर रहना ही भला। क्योंकि मनुष्य जैसे आदमियों को देखता और जैसोंकी संगति करता है, वैसा ही हो जाता है। रागियोंकी संगतसे वैरागी भी रागी या विषय-भोगी हो जाता है। जल और वृक्षोंके पत्ते खानेवाले ऋषि स्त्रियों के देखने-मानसे अपने तपसे हीन हो गये। इसीलिये शास्त्रोंमें लिखा है कि, सन्यासी संसारियोंसे दूर रहे। वास्तविक महापुरुष जो सच्चे ब्रह्मज्ञानी या रासायनिक हैं; किसी के भी द्वारपर नहीं जाते। जिसे कुछ कामना होती है; वही किसीके द्वारपर जाता है। कामनाहीन पुरुष कभी किसी
इती (२)
कुच- के स अर्थ नाम नाम
एक
रम यो
( ३१२ )
के पास नहीं जाता। सच्चे महात्मा सँसारियोंसे अपनी जान छिपाते हैं।
दो महात्मा जो राजासे मिलना नहीं चाहते थे।
एक नगरके बाहर बनमें दो बड़े ही त्यागी महात्मा रहते थे। राजाने चाहा कि, मैं उनसे मिलूँ। राजा अपने परिवार सहित उनसे मिलने गया। महात्माओंने सोचा—यह तो बुरी बला लगी। इसे सदाको टालना चाहिये। आज यह आया है, कल नगर भर आवेगा। फिर हम तो भजन ही न कर सकेंगे। जब राजा पास पहुँचा, तो वे आपसमें लड़ने लगे। एक कहने लगा,—“तने मेरी रोटी खाली।” दूसरे ने कहा—“तुने भी तो कल मेरी खा ली थी।” यह हाल देखकर राजाको घृणा हो गई और वह लौट आया। इस तरह महात्माओंके एकान्तवासमें विघ्न न पड़ा।
सँसारियों की संगति बुरी।
एक महात्मा कहींसे आकर आशीर्में रह गये। दस पाँच वर्ष बाद अनेक लोग उन्हें जान गये और उन्हें अपने-अपने घर
( ३१३ )
भोजनके लिये ले जाने लगे । महात्माने देखा कि, घरोंमें जानेसे विश्लेष होता है, इसलिये उन्होंने अपनी लंगोटोही उतारकर पैक दी, कि नंगे रहनेसे लोग घरोंपर न ले जायेंगे । पर फल उल्टा हुआ, उनकी महिमा और भी बढ़ गई । अब तो बड़े-बड़े राजा, रईस और ज़मानदार उनके दर्शनों को आने लगे । उनका सारा समय अमीरोंसे मिलनेमें ही बीतने लगा । इतनेमें एक और महात्मा आये और उनसे एकान्त में पूछा—“क्या हाल है ?” महात्माने कहा—“बवासीरसे मरते हैं ।” आगन्तुक महात्माने कहा—“लोग तो आपको खिन्न कहते हैं ।” महात्माने कहा—“कहा करें, लोग मूर्ख हैं । हमारे चित्तमें तो वासनायेँ भरी हैं, न जाने हमें किस योनियें जन्म लेना होगा हमारा तो सारा वेराग्य इन धनियों की संगतिमें ही नष्ट हो गया ।” सब है, निवृत्ति-मार्गवालोंको प्रवृत्ति मार्गवालोंकी संगति करना अच्छा नहीं ।
छप्पय ।
वसैं गुहागिरि, शुचित शिला शय्या मनमानी । वृक्षवकलके वसन, स्वच्छ सुरसरिको पानी ॥ वनमृग जिनके मित्र, वृक्षफल भोजन जिनके । विद्या जिनकी नारि, नहीं सुरपति सभ तिनके । ते लगत ईश सभ मनुज मोहि, तनुशुचित ऐसे जग भये । जे पर सेवा के काजको, हाथ नाहि जोरत नए ॥६४॥
( ३१४ )
94. I think such persons are only affluent who do not bow their heads to any one, who make a mountain stone their bed, a cave their home, the bark of trees their clothes, the wild deer their friends and the soft fruits of wild trees their food, who drink the water coming out of natural springs and who consider knowledge only to be their beloved wife.
सत्याभेव त्रिलोकीसरिति हरशिररबुम्बिनीवच्छटायां सद्गृत्तिं कल्पयन्त्यांवटविटपिभैर्वैरुक्तैः सत्फलैरच । कोऽयं विद्वान् विपत्तिन्म्वरजन्तिरुजातीव दुःखासिकांनावचनं वीक्षेत दुःस्थे यदि हि न विमुपात्स्ये कुटुम्बेऽनुकम्पाम् ॥६५॥
जबकि गंगा, जो शिवजीके मस्तकको चूमती हुई भली मालूम होती है, वङ्गकी डालियोंकी छालों और अपने तट पर लगे हुए फलोंसे आदमीका गुजारा करनेका तैयार है, तब कौन विद्वान् या ज्ञानी, यदि दुःखित कुटुम्बियों पर दया न आती तो, कंगालीकी मुसीबतोंसे आह भरती हुई—दुःखसे गहरे सौंस लेती हुई—जो का मुख देखना चाहता ? ॥६५॥
मतलब यह है कि, पुस्तकको किसी प्रकारका भी दुःख उठाने की जरूरत नहीं, उसे रंगा ही सब कुछ देने को तैयार है। वह गङ्गाजल पीकर और उसके किनारे पर उगे हुए वनफल खाकर और वटवृक्षकी छालों के कपड़े पहन कर गुजारा कर सकता है, पर ली के कारण वह ऐसा कर नहीं सकता। सारांश यह कि, सब दुखोंकी मूल ली है। यदि
( ३१५ )
कुटुम्ब-वृद्धिकी जरूरत न हो, तो स्त्री की दूरकार नहीं, और यदि स्त्री न हो तो फिर दुःख ही क्या ? लोगोंकी खुशामद करने, जने-जने की लछोपसो करने, दुष्टों के कटुवचन सुनने को स्त्री ही मजबूर करती है । दया के मारे पुरुषसे उसका और उसके बच्चोंका कष्ट देखा नहीं जाता ।
व्यपय ।
सोहत जो शिवसीस, जटा सुरसरिकी धारा । बटतर बरकल फूल, जासु सदवृत्ति अपारा ॥ त्याग सुखद अस गंग, कौन ऐसो नर वो है । परिजन करणार्होन, नारिको आनन जोहै ॥ दीर्घ शवाससों विपत्तिचर, जीरण भारी गहतु है । सब विधि यह दुखकी स्नान, यति निर्दय जेहि लिय कहतु है ॥६५॥
95. When the Ganges which looks beautiful in her action of kissing the Shiva's head, is ready to supply a livelihood by offering the bark of banyan trees and good fruits growing on her banks, what wise man would care to look at the face of a wife heaving deep sighs of distress caused by extreme poverty, were it not for kindness towards the afflicted members of his family ?
उवानेषु विचित्रभोजनविधिस्तौत्रातितीर्णं तपः कौपीनावरणं सुवस्त्रमभितं भिक्षाटनं यगडनय ॥ आसनं मरणं च मंगलममं यत्सो समुत्पद्यते तां कार्शी परिहृत्य हन्त विवृधैरन्यत्र किं स्वीयते ॥६६॥