भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३०३ )

महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—

भरे हुए हैं हज़ारों अर्मी ।

फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।

कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।

मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।

मेरे मनमें हज़ारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है । हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया । अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ ।

इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—

तीनहिं लोक अहार कियो सब ।

साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥

और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।

कादत आँख डरावत यानी ॥

दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।

या हिरा मैं यह ढाकिन यानी ॥

सुन्दर खात भये कितने दिन !

हे तृष्णा ! अजहु न अधानी ॥

इस तृष्णासे सभी सर्मभ्दार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर पेसी हो बाते कही हैं । इस तृष्णाके