वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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महाकवि दाग भी घबरा कर कहते हैं :—
भरे हुए हैं हज़ारों अर्मी ।
फिर उस पै है हसरतों की हसरत ।
कहाँ निकल जाऊँ या इलाही ।
मैं दिलकी वसन्त से तंग होकर ।
मेरे मनमें हज़ारों वासनायें हैं, पर वासनाओंके पूण न होनेका दुःख भी कुछ कम नहीं है । हे ईश्वर ! मैं अपने मनकी विशालतासे तंग हो गया । अब मेरा जी यही चाहता है, कि इस विराट् दिलसे तंग होकर कहीं चला जाऊँ ।
इसी तरह महात्मा सुन्दरदासजी भी कहते हैं—
तीनहिं लोक अहार कियो सब ।
साव समुद्र पियो पुनि पानी ॥
और जहाँ तहाँ ताकत डोलत ।
कादत आँख डरावत यानी ॥
दाँता दिखावत जीभ हिलावत ।
या हिरा मैं यह ढाकिन यानी ॥
सुन्दर खात भये कितने दिन !
हे तृष्णा ! अजहु न अधानी ॥
इस तृष्णासे सभी सर्मभ्दार अन्तमें दुखी हुए हैं और उन्होंने पछता-पछता कर पेसी हो बाते कही हैं । इस तृष्णाके