भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३०२ )

A lonely place is for the spiritual salvation of those who practise self-restraint, while it increases hundredfold the lust of sensual people.

जीर्ण एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरां यौवनं हन्तंगिषु गुणारच वंध्यफलतां याता गुणैर्बिना ॥ किं युक्तं सहसाऽभ्युपैति बलवान्कालः कृतांतोऽचमी

ब्राह्मातंसंस्मरशासनांध्रियुगलं मुक्त्वाऽस्तिनान्यागतिः ॥६१॥

हमारी इच्छायें हमारे हृदयमें ही जीर्ण हो गई, जवानी भी चली गई, हमारे अच्छे-अच्छे गुण भी कुरददानोंके न होनेसे बेकार हो गये, सर्वशक्तिमान् सर्वनाशक काल ( मृत्यु ) शीघ्र-शीघ्र हमारे पास आ रहा है ; इसलिये अब हमारी समझमें कामारि शिवके चरणोंके सिवा और जगह हमारी रक्षा नहीं है ॥६१॥

मनुष्य दुःखित होकर कहता है,—हमारे मनकी मनमें ही रह गई, हमारे अर्मान न निकले, और जवानी कूँच कर गई ; अब उसके आनेकी भी उम्मीद नहीं, क्योंकि जवानी किसीकी भी लौटकर आती सुनी नहीं ।

मनुष्यकी तृष्णा कभी नहीं बुझती, एक-पर-एक इच्छा उठा ही कसती है । इच्छायें पूरो नहीं होतीं और मौन आ जाता है । महाकवि गाल्छिब भी पछता कर कहते हैं :—

हजारों स्वप्नहिशें ऐसी, कि हर स्वप्नहिश पै दम निकले । बहुत निकले झेरे अर्मान, लेकिन फिर भी कम निकले ॥