भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २६६ )

ले—अमर होनेको यही एक तरकीब है ; बर्ना मौत किसीका निशान नहीं छोड़ती ।

छप्पय ।

जों लौं देह निरोग, और जों लौं न जरा तन । अरु जों लौं बलवान् आयु, अरु इन्द्रिनके गन । तौं लौं निज कल्याण करन को, यल विचारत । वह पण्डित वह धीर वीर, जो प्रथम संहारत । फिर होता कहा जजीर भये, जप तप संयम नहि बनत । भव काम उठयौं निज भवन जब, तब क्योंकर कूपहि खनत ॥८८॥

88. As long as the body is in good health and old age is still far off, as long as the faculties of senses are strong and the end of life has not come, a wise man should try his best for his spiritual weal. When the house has caught fire what is the use of attempting to dig a well.

नाभ्यस्ता सुवि वादिश्वन्दमनी विद्या विनीतोचिता

खड्गाग्रैः करिकुम्भीठलनैर्नाकं न नीतं यशः

कान्ताकोमलपल्लवाधररसः पीतो न चन्द्रोदये

तारुण्यं गतमेव निष्फलमहो शून्यालयं दीप्तवत् ॥८९॥

हमने इस जगतमें नम्रोंको सन्तुष्ट करनेवाली और वादियोंका मान भञ्जन करनेवाली विद्या नहीं पढ़ी, तलवारकी धार से हार्थीके मस्तक का पिछला भाग काटकर अपना यश स्वर्ग तक नहीं