भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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होता है ; किन्तु वही कामियों की कामञ्ज्वाला को बढ़ानेवाला होता है ॥६०॥

जिस तरह स्वाति-बूँद सीपमें पड़नेसे मोती और केहेमें कपूर हो जाती है, किन्तु सर्पमुखमें पड़नेसे विषका रूप धारण करती है ; उसी तरह एक हो चीज पुष्प-भेदसे अलग-अलग गुण दिखाती है। ज्ञानसे अच्छे लोगोंका अभिमान नाश हो जाता है, वे सब किसीको अपने बराबर समझते हैं, सबके साथ सहानुभूति रखते हैं, किसीका दिल नहीं दुखाते ; किन्तु उसी ज्ञानसे दुष्ट लोगोंकी दुष्टता और भी बढ़ जाती है, वे अपने सामने जगत्को तुच्छ समझते हैं ; विद्याभिमानके मारे किसीकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखते, अपने सिवा सबको पशु समझते हैं। एक ही ज्ञान दो स्थानोंमें स्थान-भेदसे अपना अलग-अलग प्रभाव दिखाता है। जैसे ; एकान्त स्थान योगियोंके चित्तको ब्रह्मविचारमें लीन करता है और इससे उनको परमपद-मुक्ति-मिल जाती है ; किन्तु वही एकान्त स्थान कामियोंके दिलोंमें मस्ती पैदा करता है।

दोहा ।

ज्ञान घटावै मान मद, ज्ञानहि देय बदाय ।

रहसि मुक्ति पावै यती, कामी रत लपटाय ॥६०॥

90 Knowledge serves the good men as a destroyer of their vanity and false pride. In some, it enhances the same evils.

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