भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २६७ )

कफ-खाँसी और दम घेर लेंगे, आँखोंसे न दीखेगा, कानोंसे न सुनाई देगा, गलेमें घर-घर कफ बोलने लगेगा, मौत अपना पन्ना जमा देगी, तब आप क्या करेंगे ? अर्थात् कुछ नहीं । उस समय यदि आप कुछ करनेकी चेष्टा करेंगे भी, तो आपकी दशा उसकी सी होगी, जो घरमें आग लगने पर कूआ खोदता है ।

किसीने कहा है :—

प्रथमे नाजिता विद्या, द्वितीये नाजितं धनं ।

तृतीये नाजितं पुरयं, चतुर्थे किं करिष्यति ॥

बचपनमें यदि विद्या नहीं सीखी, जवानोंमें यदि धन सञ्चय नहीं किया, बुढ़ापेमें यदि पुण्य नहीं किया ; तो वौधेपनमें क्या करोगे ?

सबसे अच्छी बात तो बचपनमें ही परमात्मा की भक्ति करना है । भुव और प्रह्लादने बचपनमें ही भक्ति करके परमात्मके दर्शन किये थे । अगर इस उम्रमें न हो सके, तो जवानोंमें ; और जवानोंमें भी न हो सके तो बुढ़ापे में तो चूकना ही न चाहिये । खों-पुत्र धन-दौलत का मोह छोड़, परमात्मामें मन लगाओ ; आज-कल पर मत टालो ; क्योंकि मौत हर समय घातमें है, न जाने कब तुम्हें लेजाय । जब वह आजायगी, तब तुमसे कुछ करते-घरते न बनेगा, तुम घबरा जाओगे, मुह से परमात्माका नाम न निकलेगा और हाथोंसे दान या पराया उपकार न कर सकोगे । उस समय तुम्हारा परलोक