भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अज्ञान जगित यह मोहदू, मिट्ठ्यों तिहारे संगसों ।

आनन्द अखण्डानन्दको, छाप रहो रसरंग सों ॥८७॥

87. O mother Earth, O father Air, O friend Light, O kinsman Water, O brother space, I did you all my last farewell greeting ! In company with you, as the composite parts of my physical body, I did the good deeds which bore the fruit of endowing me with pure self-consciousness which again destroyed all my earthly attachments. I now go to be absorbed in the Supreme Eternal.

चेष्टा और समर्थ ही पु वेसी

यावत्त्वस्थभिर्द कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा

यावच्चोन्द्रियशक्तिरप्रतिहिता यावत्त्वयो नायुषः ॥

आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महा-

न्मोदीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥८८॥

कर्म बह मिर खि औ का हूं

जब तक शरीर ठीक हालतमें है, बुढ़ापा दूर है, इन्द्रियों की शक्ति बनी हुई है, आयुके दिन बाकी हैं, तभी तक बुद्धिमान को अपने कल्याणकी चेष्टा अच्छी तरह से कर लेनी चाहिये । घर जलने पर कूबों खोदने से क्या फायदा ? ॥८८॥

जब तक आपका शरीर निरोग और तन्दुरुस्त रहे, बुढ़ापा न आवे, आपको इन्द्रियोंकी शक्ति ठीक बनी रहे, आपका अन्त दूर हो, उम्र बाकी दीखे, तभी तक आप अपनी भलाई की चेष्टा कर लीजिये ; यानी ऐसी हालतमें ही भगवान्का भजन कर लीजिये । जब आप रोगसे जर्जरित हो जायेंगे,