वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 648 में से
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मनुष्य-शरीर पृथ्वी, वायु, तेज, जल और आकाश—पाँच तत्त्वोंसे बनता है। जिसे आत्मज्ञान हो गया है, जिसने ब्रह्म को पहचान लिया है, वह इन पाँचों तत्त्वोंसे विदा लेता है और प्रणाम करके कहता है, कि मैं आप पाँचोंके सङ्ग रहनेसे—यह शरीर धारण करने से—इस योग्य हुआ कि, ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सका; अब मेरा आपका साथ न होगा, अब मैं चोलेमें न आऊँगा, अब मुझे जन्म लेना न पड़ेगा। मैं आप लोगोंका कृतज्ञ हूँ; क्योंकि आप की सुसंगति से ही मुझे यह फल मिला है। अब मैं आपसे सदा को विदा होता हूँ। अब मैं ब्रह्मके आनन्द में मग्न हूँ। अब मुझे यहाँ आनेकी, आप लोगोंकी संगति करने की; यानी शरीर धारण करने की ज़रूरत नहीं। मतलब यह है, कि मनुष्यका चोला ब्रह्मज्ञान के लिए मिलता है; और चोलोंमें यह ज्ञान हो नहीं सकता। जो मनुष्य-चोलेमें आकर ब्रह्मज्ञान लाभ करते हैं और उसकी बदौलत परम पद या मोक्ष प्राप्त करते हैं,—वे ही धन्य हैं, उन्हींका मनुष्य-देह पाना सार्थक है।
इप्यय ।
अरी मेदिनी-मात, तात-मारुत सुन एरे ।
तेज-सखा जल-श्रात, व्योम-बन्धु सुन मेरे ।
तुमको करत प्रणाम, हाथ तुम आगे जोरत ।
तुम्हरेही सत्सांग, सुकृतकौ सिन्धु भक्रोरत ।