भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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mind, the objects of pleasure are transitory like the flashes of lightning in the rainy season and the embracing of beloved women also does not last for a long time. O men, it is better for you to fix your heart on Brahma in order to swim across the ocean of worldly fears.

ब्रह्मण्डमण्डलीमात्रं किं लोभाय मनस्विनः ।

शकरीस्फुरितेनात्रैः क्षुब्धता जातु जायते ॥२३॥

जो विचारवान् है, जो ब्रह्मज्ञानी है, उसे संसार लुभा नहीं सकता। मछलीके उछलनेसे समुद्र नहीं उमड़ता ॥२३॥

जिस तरह सफरी मछलीके उछल-कूद मवानेसे समुद्र अपनी गम्भीरता को नहीं छोड़ता, ज़रा भी नहीं उमगता, जैसा का तैसा बना रहता है; उसी तरह विचारवान् ब्रह्मज्ञानी संसारी-पदार्थोंपर लट्ठू नहीं होता वह समुद्रकी तरह गम्भीर ही बना रहता है; अपनी गम्भीरता नहीं छोड़ता। समुद्र जिस तरह मछलीकी उछल-कूदको कुछ नहीं समझता, उसी तरह वह त्रिलोककी की सुख-सम्पत्ति को तुच्छ समझता है। मतलब यह है, कि संसारी विषय-भोग उन्हीं को लुभाते हैं, जो विचारवान् नहीं हैं, जिनमें विचार-शक्ति नहीं है, जिन्हें ब्रह्मज्ञानका आनन्द नहीं मालूम है। उस्ताद ज़ौक कहते हैं:—

दुनिया है वह सग्याद् कि सब दाम में इसके । आ जाते हैं लेकिन कोई दाना नहीं आता ॥